ग्वाल कवि

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  1. रसिकानंद [1],
  2. रसरंग [2],
  3. कृष्ण जू को नखशिख [3] और
  4. दूषणदर्पण [4]
  1. हम्मीर हठ [5] और
  2. गोपीपच्चीसी।
  3. 'राधामाधव मिलन' और
  4. 'राधा अष्टक'।


ग्रीषम की गजब धुकी है धूप धाम धाम,
गरमी झुकी है जाम जाम अति तापिनी।
भीजे खसबीजन झलेहू ना सुखात स्वेद,
गात न सुहात, बात दावा सी डरापिनी
ग्वाल कवि कहैं कोरे कुंभन तें कूपन तें,
लै लै जलधार बार बार मुख थापिनी।
जब पियो तब पियो, अब पियो फेर अब,
पीवत हूँ पीवत मिटै न प्यास पापिनी

मोरन के सोरन की नैको न मरोर रही,
घोर हू रही न घन घने या फरद की।
अंबर अमल, सर सरिता विमल भल
पंक को न अंक औ न उड़न गरद की
ग्वाल कवि चित्त में चकोरन के चैन भए,
पंथिन की दूर भई, दूषन दरद की।
जल पर, थल पर, महल, अचल पर,
चाँदी सी चमक रही चाँदनी सरद की

जाकी खूबखूबी खूब खूबन की खूबी यहाँ,
ताकी खूबखूबी खूबखूबी नभ गाहना।
जाकी बदजाती बदजाती यहाँ चारन में,
ताकी बदजाती बदजाती ह्वाँ उराहना
ग्वाल कवि वे ही परमसिद्ध सिद्ध जो है जग,
वे ही परसिद्ध ताकी यहाँ ह्वाँ सराहना।
जाकी यहाँ चाहना है ताकी वहाँ चाहनाहै,
जाकी यहाँ चाह ना है ताकी वहाँ चाहना

दिया है खुदा ने खूब खुसी करो ग्वाल कवि,
खाव पियो, देव लेव, यहीं रह जाना है।
राजा राव उमराव केते बादशाह भए,
कहाँ ते कहाँ को गए, लग्यो न ठिकाना है
ऐसी ज़िंदगानी के भरोसे पै गुमान ऐसे,
देस देस घूमि घूमि मन बहलाना है।
आए परवाना पर चलै ना बहाना, यहाँ,
नेकी कर जाना, फेर आना है न जानाहै



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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अलंकार
  2. संवत 1904
  3. संवत 1884
  4. संवत 1891
  5. संवत 1881

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