बलभद्र मिश्र

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  1. बलभद्री व्याकरण,
  2. हनुमन्नाटक और
  3. गोवर्धन सतसई टीका।

पाटल नयन कोकनद के से दल दोऊ,
बलभद्र बासर उनीदी लखी बाल मैं।
सोभा के सरोवर में बाड़व की आभा कैंधौं,
देवधुनी भारती मिली है पुन्यकाल मैं
काम-कैवरत कैधौं नासिकर उडुप बैठो,
खेलत सिकार तरुनी के मुख ताल मैं।
लोचन सितासित में लोहित लकीर मानो,
बाँधो जुग मीन लाल रेशम की डोर मैं

मरकत के सूत कैधौं पन्नग के पूत अति
राजत अभूत तमराज कैसे तार हैं।
मखतूल गुनग्राम सोभित सरस स्याम,
काम मृग कानन कै कुहू के कुमार हैं
कोप की किरन कै जलज नाल नील तंतु,
उपमा अनंत चारु चँवर सिंगार हैं।
कारे सटकारे भींजे सोंधो सों सुगंधा बास,
ऐसे बलभ्रद नवबाला तेरे बार हैं


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