थान कवि

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दासन पै दाहिनी परम हंसवाहिनी हौ,
पोथी कर, वीना सुरमंडल मढ़त है।
आसन कँवल, अंग अंबर धवल,
मुख चंद सो अंवल, रंग नवल चढ़त है
ऐसी मातु भारती की आरति करत थान,
जाको जस बिधि ऐसो पंडित पढ़त है।
ताकी दयादीठि लाख पाथर निराखर के,
मुख ते मधुर मंजु आखर कढ़त है


कलुषहरनि सुखकरनि सरनजन
बरनि बरनि जस कहत धारनिधार।
कलिमलकलित बलित अघ खलगन,
लहत परमपद कुटिल कपटतर
मदनकदन सुरसदन बदन ससि,
अमल नवल दुति भजन भगतवर।
सुरसरि! तव जल दरस परस करि,
सुरसरि! सुभगति लहत अधम नर


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