श्रीपति (कवि)

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  2. रससागर,
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  4. विक्रमविलास,
  5. सरोज कलिका,
  6. अलंकारगंगा।

जल भरे झूमैं मानौ भूमै परसत आय,
दसहु दिसान घूमैं दामिनि लए लए।
धूरिधार धूमरे से, धूम से धुंधारे कारे,
धुरवान धारे धावैं छवि सों छए छए
श्रीपति सुकवि कहै घेरि घेरि घहराहिं,
तकत अतन तन ताव तें तए तए।
लाल बिनु कैसे लाजचादर रहैगी आज,
कादर करत मोहिं बादर नये नये

सारस के नादन को बाद ना सुनात कहूँ,
नाहक ही बकवाद दादुर महा करै।
श्रीपति सुकवि जहाँ ओज ना सरोजन की,
फूल न फुलत जाहि चित दै चहा करै
बकन की बानी की बिराजति है राजधानी,
काई सों कलित पानी फेरत हहा करे।
घोंघन के जाल, जामें नरई सेवाल ब्याल,
ऐसे पापी ताल को मराल लै कहा करै?

घूँघट उदयगिरिवर तैं निकसि रूप
सुधा सो कलित छवि कीरति बगारो है।
हरिन डिठौना स्याम सुख सील बरषत,
करषत सोक, अति तिमिर बिदारो है
श्रीपति बिलोकि सौति बारिज मलिन होत,
हरषि कुमुद फूलै नंद को दुलारो है।
रंजन मदन, तन गंजन बिरह, बिबि,
खंजन सहित चंदबदन तिहारो है



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