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  1. जयसिंह प्रकाश [1],
  2. श्रृंगारमंजरी [2],
  3. श्रृंगार शिरोमणि [3],
  4. अलंकार चिंतामणि [4],
  5. काव्य विनोद [5],
  6. रसराज की टीका [6],
  7. रत्नचंद्रिका [7],
  8. जुगल नखशिख [8],
  9. बलभद्र नखशिख की टीका।
  10. इनका कविता काल संवत 1880 से 1900 तक ठहरता है।

सीख सिखाई न मानति है, बर ही बस संग सखीन के आवै।
खेलत खेल नए जल में, बिना काम बृथा कत जाम बितावै
छोड़ि कै साथ सहेलिन को, रहि कै कहि कौन सवादहि पावै।
कौन परी यह बानि, अरी! नित नीरभरी गगरी ढरकावै


चंचलता अपनी तजि कै रस ही रस सों रस सुंदर पीजियो।
कोऊ कितेक कहै तुमसों तिनकी कही बातन को न पतीजियो
चोज चवाइन के सुनियो न यही इक मेरी कही नित कीजियो।
मंजुल मंजरी पै हौ, मलिंद! विचारि कै भार सँभारि कै दीजियो

तड़पै तड़िता चहुँ ओरन तें, छिति छाई समीरन की लहरैं।
मदमाते महा गिरिशृंगन पै, गन मंजु मयूरन के कहरैं
इनकी करनी बरनी न परै, मगरूर गुमानन सों गहरैं।
घन ये नभमंडल में छहरैं, घहरैं कहुँ जाय, कहूँ ठहरैं

कानि करै गुरुलोगन की, न सखीन की सीखन ही मन लावति।
ऐंड़ भरी अंगराति खरी, कत घूँघट में नए नैन नचावति
मंजन कै दृग अंजन ऑंजति, अंग अनंग उमंग बढ़ावति।
कौन सुभाव री तेरो परयो, खिन ऑंगन में खिन पौरि में आवति

कहा जानि, मन में मनोरथ विचारि कौन,
चेति कौन काज, कौन हेतु उठि आई प्रात।
कहै परताप छिन डोलिबो पगन कहूँ,
अंतर को खोलिबो न बोलिबो हमैं सुहात
ननद जिठानी सतरानी, अनखानी अति,
रिस कै रिसानी, सो न हमैं कछु जानीजात।
चाहौ पल बैठ रहौ, चाहौ उठि जाव तौन,
हमको हमारी परी, बूझै को तिहारी बात?

चंचल चपला चारु चमकत चारों ओर,
झूमि झूमि धाुरवा धारनि परसत है।
सीतल समीर लगै दुखद वियोगिन्ह,
सँयोगिन्ह समाज सुखसाज सरसत है
कहैं परताप अति निविड़ अंधेरी माँह,
मारग चलत नाहि नेकु दरसत है।
झुमड़ि झलानि चहुँ कोद तें उमड़ि आज,
धाराधार धारन अपार बरसत है


महाराज रामराज रावरो सजत दल,
होत मुख अमल अनंदित महेस के।
सेवत दरीन केते गब्बर गनीम रहैं,
पन्नग पताल त्यों ही डरन खगेस के
कहैं परताप धारा धाँसत त्रासत,
कसमसत कमठ पीठि कठिन कलेस के।
कहरत कोल, हहरत हैं दिगीस दल,
लहरत सिंधु, थहरत फन सेस के


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. संवत 1882
  2. संवत 1889
  3. 1894
  4. संवत 1894
  5. संवत 1896
  6. संवत 1896
  7. सतसई की टीका, संवत 1896
  8. सीता राम का नखशिख वर्णन

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