गुरदीन पांडे

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मुखससी ससि दून कला धरे । कि मुकुतागन जावक में भरे।
ललितकुंदकलीअनुहारिके । दसन हैं वृषभानु कुमारि के
सुखद जंत्रा कि भाल सुहाग के । ललित मंत्र किधौं अनुरागके।
भ्रकुटियोंवृषभानुसुतालसै । जनु अनंग सरासन को हँसै
मुकुर तौ पर दीपति को धानी । ससि कलंकित, राहु बिथा घनी।
अपर ना उपमा जग में लहै । तव प्रिया! मुख के सम को कहै?



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