तोषनिधि

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  1. विनयशतक और
  2. नखशिख।

भूषन भूषित दूषन हीन प्रवीन महारस मैं छबि छाई।
पूरी अनेक पदारथ तें जेहि में परमारथ स्वारथ पाई
औ उकतैं मुकतै उलही कवि तोष अनोषभरी चतुराई।
होत सबै सुख की जनिता बनि आवति जौं बनिता कविताई

एक कहैं हँसि ऊधावजू! ब्रज की जुवती तजि चंद्रप्रभा सी।
जाय कियो कहँ तोष प्रभू! इक प्रानप्रिया लहि कंस की दासी
जो हुते कान्ह प्रवीन महा सो हहा! मथुरा में कहा मति नासी।
जीव नहीं उबियात जबै ढिग पौढ़ति हैं कुबिजा कछुआ सी

श्रीहरि की छबि देखिबे को अंखियाँ प्रति रोमहि में करि देतो।
बैनन को सुनिबे हित स्रौन जितै तित सो करतौ करि हेतो
मो ढिग छाँड़ि न काम कहूँ रहै तोष कहै लिखितो बिधि एतो।
तौ करतार इती करनी करिकै कलि में कल कीरति लेतो

तौ तन में रवि को प्रतिबिंब परे किरनै सो घनी सरसाती।
भीतर हू रहि जात नहीं, अंखियाँ चकचौंधि ह्वै जाति हैं राती
बैठि रहौ, बलि, कोठरी में कह तोष करौं बिनती बहु भाँती।
सारसीनैनि लै आरसी सो अंग काम कहा कढ़ि घाम में जाती?


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