सूरति मिश्र

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हिम सो, हर के हास सो जस मालोपम ठानि

सो असंगति, कारन अवर, कारज औरै थान।
चलि अहि श्रुति आनहि डसत, नसत और के प्रान

तेरे ये कपोल बाल अतिही रसाल,
मन जिनकी सदाई उपमा बिचारियत है।
कोऊ न समान जाहि कीजै उपमान,
अरु बापुरे मधूकन की देह जारियत है
नेकु दरपन समता की चाह करी कहूँ,
भए अपराधी ऐसो चित्त धारियत है।
'सूरति' सो याही तें जगत बीच आजहूँ लौ,
उनके बदन पर छार डारियत है


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