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	<title>श्रावणी उपाकर्म - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>रविन्द्र प्रसाद: ''''श्रावणी उपाकर्म''' श्रावण मास के श्रवण व चंद्र के म...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
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		<updated>2014-05-01T09:51:44Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;श्रावणी उपाकर्म&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; &lt;a href=&quot;/india/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A3_%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B8&quot; class=&quot;mw-redirect&quot; title=&quot;श्रावण मास&quot;&gt;श्रावण मास&lt;/a&gt; के श्रवण व चंद्र के म...&amp;#039; के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;'''श्रावणी उपाकर्म''' [[श्रावण मास]] के श्रवण व चंद्र के मिलन (पूर्णिमा) या [[हस्त नक्षत्र]] में 'श्रावण पंचमी' को होता है। श्रावणी पर्व [[वैदिक काल]] से शरीर, मन और [[इन्द्रियाँ|इन्द्रियों]] की पवित्रता का पुण्य पर्व माना जाता है। इस पर्व पर की जाने वाली सभी क्रियाओं का यह मूल भाव है कि बीते समय में मनुष्य से हुए ज्ञात-अज्ञात बुरे कर्म का प्रायश्चित करना और भविष्य में अच्छे कार्य करने की प्रेरणा देना।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==अर्थ==&lt;br /&gt;
उपाकर्म का अर्थ है &amp;quot;प्रारंभ करना&amp;quot;। उपाकरण का अर्थ है &amp;quot;आरंभ करने के लिए निमंत्रण&amp;quot; या &amp;quot;निकट लाना&amp;quot;। [[वैदिक काल]] में यह [[वेद|वेदों]] के अध्ययन के लिए विद्यार्थियों का गुरु के पास एकत्रित होने का काल था।&amp;lt;ref name=&amp;quot;aa&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://religion.bhaskar.com/2010/05/04/shravani-upakarma-938236.html|title=इंद्रियों की पवित्रता का पुण्य पर्व श्रावणी उपाकर्म|accessmonthday=01 मई|accessyear=2014|last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=हिन्दी}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==आयोजन काल==&lt;br /&gt;
श्रावणी उपाकर्म के आयोजन काल के बारे में धर्म ग्रंथों में लिखा गया है कि &amp;quot;जब वनस्पतियां उत्पन्न होती हैं, श्रावण मास के श्रवण व चंद्र के मिलन (पूर्णिमा) या हस्त नक्षत्र में श्रावण पंचमी को उपाकर्म होता है।&amp;quot; इस अध्ययन सत्र का समापन 'उत्सर्जन' या 'उत्सर्ग' कहलाता था। यह सत्र [[माघ]] [[शुक्ल पक्ष]] [[प्रतिपदा]] या [[पौष]] [[पूर्णिमा]] तक चलता था। [[श्रावण]] शुक्ल पक्ष पूर्णिमा के शुभ दिन '[[रक्षाबंधन]]' के साथ ही श्रावणी उपाकर्म का पवित्र संयोग बनता है। विशेषकर यह पुण्य दिन [[ब्राह्मण]] समुदाय के लिए बहुत महत्व रखता है। &lt;br /&gt;
====विधि====&lt;br /&gt;
श्रावणी उपाकर्म के तीन पक्ष हैं-&lt;br /&gt;
#प्रायश्चित्त संकल्प&lt;br /&gt;
#[[संस्कार]]&lt;br /&gt;
#स्वाध्याय&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपाकर्म में सर्वप्रथम होता है 'प्रायश्चित्त रूप में हेमाद्रि स्नान संकल्प'। गुरु के सान्निध्य में ब्रह्मचारी [[गाय]] के [[दूध]], [[दही]], [[घृत]], गोबर और गोमूत्र तथा पवित्र कुशा से [[स्नान]] कर वर्षभर में जाने-अनजाने में हुए पापकर्मों का प्रायश्चित्त कर जीवन को सकारात्मकता से भरते हैं। स्नान के बाद [[ऋषि]] पूजन, सूर्योपस्थान एवं यज्ञोपवीत पूजन तथा नवीन [[यज्ञोपवीत]] धारण करते हैं। यज्ञोपवीत या जनेऊ आत्म संयम का [[संस्कार]] है। आज के दिन जिनका यज्ञोपवित संस्कार हो चुका होता है, वह पुराना यज्ञोपवित उतारकर नया धारण करते हैं और पुराने यज्ञोपवित का पूजन भी करते हैं। इस संस्कार से व्यक्ति का दूसरा जन्म हुआ माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि जो व्यक्ति आत्म संयमी है, वही संस्कार से दूसरा जन्म पाता है और 'द्विज' कहलाता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;aa&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
====स्वाध्याय====&lt;br /&gt;
उपाकर्म का तीसरा पक्ष स्वाध्याय का है। इसकी शुरुआत [[सावित्री]], [[ब्रह्मा]], श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा, स्मृति, सदसस्पति, अनुमति, [[छंद]] और ऋषि को घृत की आहुति से होती है। [[जौ]] के आटे में [[दही]] मिलाकर [[ऋग्वेद]] के [[मंत्र|मंत्रों]] से आहुतियां दी जाती हैं। इस [[यज्ञ]] के बाद [[वेद]]-[[वेदांग]] का अध्ययन आरंभ होता है। इस सत्र का अवकाश समापन से होता है। इस प्रकार वैदिक परंपरा में वैदिक शिक्षा साढ़े पांच या साढ़े छह मास तक चलती है। वर्तमान में '[[श्रावणी पूर्णिमा]]' के दिन ही उपाकर्म और उत्सर्ग दोनों विधान कर दिए जाते हैं। प्रतीक रूप में किया जाने वाला यह विधान हमें स्वाध्याय और सुसंस्कारों के विकास के लिए प्रेरित करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{पर्व और त्योहार}}{{व्रत और उत्सव}}{{हिन्दू कर्मकाण्ड}}&lt;br /&gt;
[[Category:व्रत और उत्सव]][[Category:पर्व और त्योहार]][[Category:हिन्दू कर्मकाण्ड]][[Category:हिन्दू धर्म कोश]][[Category:संस्कृति कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>रविन्द्र प्रसाद</name></author>
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