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	<title>ब्रजभाषा का प्रयोग - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>गोविन्द राम: ''''साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग''' ब्रज के अतिरिक्त ब...' के साथ नया पृष्ठ बनाया</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; ब्रज के अतिरिक्त ब...&amp;#039; के साथ नया पृष्ठ बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;'''साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग''' ब्रज के अतिरिक्त बोली-क्षेत्रों में होने के कारण उन-उन क्षेत्रों की बोलियों के [[रंग]] भी जुड़े हैं। आज की साहित्यिक हिन्दी में भी इस प्रकार का प्रभाव दिखाई पड़ता है। वह एक किसी एक मुहावरे एक चाल में बँधी हुई भाषा नहीं है, उसमें क्षेत्रीय रंगतों को अपनाने की और उन्हें अपने रंग में डालने की क्षमता है। ब्रजभाषा में भी [[भोजपुरी भाषा|भोजपुरी]], [[अवधी भाषा|अवधी]], बुन्देली, [[पंजाबी भाषा|पंजाबी]], पहाड़ी, राजस्थानी प्रभावों की झाँई पड़ी और उससे ब्रजभाषा में दीप्ति और अर्थवत्ता आई। कुछ शब्दकोश भी बढ़ा, मुहावरे तो निश्चित रूप से नये-नये उसमें सन्निविष्ट हुए। [[बुन्देलखण्ड]] के कवियों में पद्माकर, ठाकुर बोधा और बख्शी हंसराज का प्रभाव उल्लेखनीय है। भोजपुरी क्षेत्र के कवियों में इतने बड़े नाम तो नहीं लिए जा सकते, लेकिन रंगपाल, छुटकन जैसे कवियों के द्वारा रचे गए फागों में भोजपुरी से भावित ब्रजभाषा की छटा एक अलग ही मिलती है। ग्वाल कवि, [[गुरु गोविन्दसिंह]] जैसे पंजाब क्षेत्र के कवियों ने पंजाबी प्रभाव दिया है। [[दादू दयाल|दादू]], सुन्दरदास और रज्जब जैसे सन्तकवियों की भाषा में (जो प्रमुख रूप से ब्रजभाषा ही है) राजस्थानी का पुट गहरा है।&lt;br /&gt;
====प्रयोग के प्रमाण====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Suryakant Tripathi Nirala.jpg|thumb|[[सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला]]]]&lt;br /&gt;
'''साहित्यिक ब्रजभाषा के सबसे प्राचीनतम''' उपयोग का प्रमाण [[महाराष्ट्र]] में मिलता है। महानुभाव सम्प्रदाय (तेरहवीं शताब्दी के अन्त) के सन्त कवियों ने एक प्रकार की ब्रजभाषा का उपयोग किया। कालान्तर में साहित्यिक ब्रजभाषा का विस्तार पूरे [[भारत]] में हुआ और अठारहवीं, उन्नीसवीं शताब्दी में दूर दक्षिण में तंजौर और [[केरल]] में ब्रजभाषा की कविता लिखी गई। [[सौराष्ट्र]] ([[कच्छ]]) में ब्रजभाषा काव्य की पाठशाला चलायी गई, जो स्वाधीनता की प्राप्ति के कुछ दिनों बाद तक चलती रही। उधर पूरब में यद्यपि साहित्यिक ब्रज में तो नहीं साहित्यिक [[ब्रज]] से लगी हुई स्थानीय भाषाओं में पद रचे जाते रहे। [[बंगाल]] और [[असम]] में इन भाषा को ‘ब्रजबुलि’ नाम दिया गया। इस ‘ब्रजबुली’ का प्रचार कीर्तन पदों में और दूर [[मणिपुर]] तक हुआ। साहित्यिक ब्रजभाषा की कविता ही गढ़वाल, कांगड़ा, [[गुलेर]], [[बूँदी]], [[मेवाड़]], किशनगढ़, चित्रकारी कलमों का आधार बनी और कुछ क्षेत्रों में तो चित्रकारों ने कविताएँ लिखीं। गढ़वाल के मोलाराम का नाम उल्लेखनीय है। गुरु गोविन्दसिंह के दरबार में ब्रजभाषा के कवियों का एक बहुत बड़ा जमघट था। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक काव्य-भाषा के रूप में ब्रजभाषा का अक्षुण्ण देशव्यापी वर्चस्व रहा। इस प्रकार लगभग पाँच शताब्दी तक बहुत बड़े व्यापक क्षेत्र में मान्यता प्राप्त करने वाली साहित्यिक भाषा रही। इस देश के [[साहित्य]] के [[इतिहास]] में ब्रजभाषा ने जो अवदान दिया है, उसे यदि हम काट दें तो देश की रसवत्ता और संस्कारिता का बहुत बड़ा हिस्सा हमसे अलग हो जायेगा। आधुनिक [[हिन्दी]] ने साहित्यिक भाषा के रूप में जो ब्रजभाषा का स्थान लिया है, वह स्थान भी ब्रजभाषा की व्यापकता के ही कारण सम्भव हुआ है। इस प्रकार से साहित्यिक ब्रजभाषा आधुनिक हिन्दी की धरती है। शुरू-शुरू में [[खड़ी बोली]] की कविता इतिवृत्तात्मकता की ओर अग्रसर हुई तो, ब्रजभाषा की धरती ने ही आधुनिक खड़ी-बोली की कविता को अधिक लचकीला बनाने की शक्ति दी, उसके उक्ति-विधान, सादृश्य-विधान और मुहावरों ने प्रेरणा दी। बहुत सूक्ष्मता से [[महावीर प्रसाद द्विवेदी|प्रसाद]], [[सुमित्रानन्दन पंत|पंत]], [[सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला|निराला]], [[महादेवी वर्मा|महादेवी]] की काव्यधारा का अध्ययन करें तो हमें ब्रजभाषा के प्रभाव से आई हुई लोच नज़र आयेगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक= प्रारम्भिक2|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{ब्रजभाषा}}{{भाषा और लिपि}}&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज]]&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रजभाषा]]&lt;br /&gt;
[[Category:भाषा और लिपि]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>गोविन्द राम</name></author>
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