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	<title>कटी संहतियाँ - अवतरण इतिहास</title>
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	<updated>2026-07-16T22:54:07Z</updated>
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		<title>यशी चौधरी: ''''कटी-संहतियाँ''' यांत्रिकी में उन दंडों (छड़ों) के सम...' के साथ नया पृष्ठ बनाया</title>
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		<updated>2018-07-21T05:26:26Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;कटी-संहतियाँ&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039; यांत्रिकी में उन दंडों (छड़ों) के सम...&amp;#039; के साथ नया पृष्ठ बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;'''कटी-संहतियाँ''' यांत्रिकी में उन दंडों (छड़ों) के समूह को कहते हैं जो एक दूसरे से हिंज द्वारा ज़ड़े रहते हैं और जिनसे कोई विशेष प्रकार की गति प्राप्त होती है। कटी-संहतियों के उदाहरण अनेक यंत्रों में देखे जा सकते हैं। पैंटोग्राफ़ नामक यंत्र में चार छड़ रहते हैं जो एक दूसरे से हिंज द्वारा जुड़े रहते हैं। इसमें बिंदु क को स्थिर रखा जाता है और सुई ख को किसी वक्र पर फेरा जाता है। तब पेंसिल ग उस वक्र का प्रवर्धित अथवा लघवाकार चित्र उतार देता है। इस प्रकार इस यंत्र को दिए हुए चित्र से बड़ा अथवा छोटा चित्र खींचने के काम में लाया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वाट का ऋजु-लेखक==&lt;br /&gt;
इन दिनों इन दिनों जब यंत्र के किसी भाग को ऋजु रेखा में चलाना रहता है तब ऐसा प्रबंध किया जाता है कि वह भाग दो स्थिर ऋजु भागों के बीच फिसले। वाष्प इंजन के आविष्कारक वाट के समय में इस प्रकार की युक्ति ठीक नहीं बन पाती थी, क्योंकि ऐसी युक्ति में बहुत सी शक्ति घर्षण द्वारा नष्ट हो जाती थी। इसलिए वाट ने 1784 ई. में एक युक्ति की उपज्ञा की जिसे 'वाट्स पैरालेल मोशन' (वाट की समांतर गति) कहते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि तीन छड़ें, क ख, ख ग और ग घ, बिंदुओं ख तथा ग पर हिंजों द्वारा जुड़ी हों और बिंदुओं क तथा घ पर स्थिर हिंज हों तो हमें वाट की युक्ति मिल जाती है। यदि छड़ ख ग पर एक बिंदु च ऐसा लिया जाए कि क ख/ग घ उ च ग/खच तो बिंदु च छड़ों के समतल में केवल एक प्रकार से चल सकेगा; वह अँग्रेजी अंग 8 लिख सकेगा जो बहुत सँकरा होगा। वस्तुत: इस सँकरी आकृति के मध्य भाग प्राय: ऋजु रहते हैं। इसलिए हम कह सकते हैं कि बिंदु च लगभग ऋजु रेखा में चलता है। वाट ने इसका उपयोग इंजन का पिस्टन चलाने में किया, परंतु सुविधा के लिए उसने तीन अतिरिक्त छड़ें जोड़ ली थीं, जिससे च की गति पैंटोग्राफ़ के सिद्धांत पर अन्यत्र पहुँच जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
19वीं शताब्दी के आरंभ में वाट के ऋजु-लेखक में सुधार करने की चेष्टा की गई। फ्रांस की सेना के एक लेफ़्टिनेंट पोसेलिए ने छह छड़ों की कटी-संहति बनाई जिससे एक बिंदु शुद्ध ऋजु रेखा में चलता था। इसे चित्र 3 में दिखाया गया है। इसमें खग उ गघ उ चख और कख उ कछ। बिंदु च और छ को स्थिर रखा जाता है; च छ की लंबाई क छ के बराबर रहती है। च अब केवल क के परित: एक वृत्त में चल सकता है; उसे इस वृत्त में चलाने पर बिंदु ग सरल रेखा में चलता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पोसेलिए की कटी-संहति में सात छड़ें रहती हैं। लोगों ने सोचा कि कम छड़ों से काम चलाया जाए तो अच्छा होगा। गणितज्ञ चेबिचफ़ ने 'सिद्ध' कर दिया कि पाँच अथवाइससे कम छड़ों की संहतियों से ऋजु-रेखात्मक गति प्राप्त नहीं हो सकती, परंतु उसका प्रमाण अशुद्ध निकला, क्योंकि 1877 ई. में हार्ट ने पाँच छड़ों की कटी-संहित की उपज्ञा की जिससे सरल रेखा खींची जा सकती थी (द्र. प्रोसीडिंग्स, लंदन मैथेमैटिकल सोसायटी, 1877)।&lt;br /&gt;
अन्य कई कटी-संहतियाँ बनी हैं जिनसे शांकव, समविभव वक्र आदि खींचे जा सकते हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 2|लेखक= |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक= नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी|संकलन= भारत डिस्कवरी पुस्तकालय|संपादन= |पृष्ठ संख्या=367 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
[[Category:वैज्ञानिक उपकरण]][[Category:यान्त्रिकी]][[Category:विज्ञान कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दी विश्वकोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>यशी चौधरी</name></author>
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