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	<title>अलंकार उपन्यास भाग-5 - अवतरण इतिहास</title>
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	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
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		<title>आदित्य चौधरी: Text replacement - &quot;शृंखला&quot; to &quot;श्रृंखला&quot;</title>
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		<author><name>आदित्य चौधरी</name></author>
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		<title>आदित्य चौधरी: Text replacement - &quot;छः&quot; to &quot;छह&quot;</title>
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लेकिन वहां भी उन्हें पाकशालाओं के धुएं, शराबियों के शोरगुल और शराब बेचने वालों की हांकपुकार से चैन न मिलता। चारों तरफ कोठी वालों ने सड़कें, मकान, चर्च धर्मशालाएं और ऋषियों के आश्रम बनवा दिये। &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;छः &lt;/del&gt;महीने न गुजरने पाये थे कि वहां एक अच्छाखासा शहर बस गया, जहां रक्षाकारी विभाग, न्याय, कारागार, सभी बन गये और वृद्ध मुंशी ने एक पाठशाला भी खोल ली। जंगल में मंगल हो गया, ऊसर में बाग़ लहराने लगा।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;देश के अन्य भागों से पापियों और भक्तों के जत्थेके-जत्थे आने लगे। उनमें से कितने ही बहुत दूर से आते थे। उनके साथ भोजन की कोई वस्तु न होती थी। एक वृद्घा विधवा को सूझी कि उनके हाथ ताजा पानी, ख़रबूज़े आदि फल बेचे जायें तो लाभ हो। स्तम्भ के समीप ही उसने मिट्टी के कुल्हड़ जमा किये। एक नीली चादर तानकर उसने नीचे फलों की टोकरियां सजाईं और पीछे खड़ी होकर हांक लगाने लगी-ठंडा पानी, ताजा फल, जिसे खाना या पानी पीना हो चला आवे। इसकी देखादेखी एक नानबाई थोड़ीसी लाल ईंटें लाया और समीप ही अपना तन्दूर बनाया। इसमें सादी और खमीरी रोटियां सेंककर वह गराहकों को खिलाता था। यात्रियों की संख्या दिनपरतिदिन ब़ने लगी। मिस्त्र देश के बड़ेबड़े शहरों से भी लोग आने लगे। यह देखकर एक लोभ आदमी ने मुसाफिरों और नौकरों, ऊंटों, खच्चरों आदि को ठहराने के लिए एक सराय बनवाई। थोड़े ही दिन में उस स्तम्भ के सामने एक बाज़ार लग गया जहां मदुए अपनी मछलियां और किसान अपने फलमेवे लालाकर बेचने लगे। एक नाई भी आ पहुंचा जो किसी वृक्ष की छांह में बैठकर यात्रियों की हजामत बनाता था और दिल्लगी की बातें करके लोगों को हंसाता था। पुराना मन्दिर इतने दिन उजड़े रहने के बाद फिर आबाद हुआ। जहां रातदिन निर्जनता और नीरवता का आधिपत्य रहता था, वहां अब जीवन के दृश्य और चिह्न दिखाई देने लगे। हरदम चहलपहल रहती। भठियारों ने पुराने मन्दिर के तहखानों के शराबखाने बना दिये और स्तम्भ पर पापनाशी के चित्र लटकाकर उसके नीचे यूनानी और मिस्त्री लिपियों में यह विज्ञापन लगा दिये-'अनार की शराब, अंजीर की शराब और सिलिसिया की सच्ची जौ की शराब यहां मिलती है।' दुकानदारों ने उन दीवारों पर जिन पर पवित्र और सुन्दर बेलबूटे अंकित किये हुए थे, रस्सियों से गूंथकर प्याज लटका दिये। तली हुई मछलियां, मरे हुए खरहे और भेड़ों की लाशें सजाई हुई दिखाई देने लगीं। संध्या समय इस खंडहर के पुराने निवासी अर्थात् चूहे सफ बांधकर नदी की ओर दौड़ते और बगुले सन्देहात्मक भाव से मर्दन उठाकर ऊंची कारनिसों पर बैठ जाते; लेकिन वहां भी उन्हें पाकशालाओं के धुएं, शराबियों के शोरगुल और शराब बेचने वालों की हांकपुकार से चैन न मिलता। चारों तरफ कोठी वालों ने सड़कें, मकान, चर्च धर्मशालाएं और ऋषियों के आश्रम बनवा दिये। &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;छह &lt;/ins&gt;महीने न गुजरने पाये थे कि वहां एक अच्छाखासा शहर बस गया, जहां रक्षाकारी विभाग, न्याय, कारागार, सभी बन गये और वृद्ध मुंशी ने एक पाठशाला भी खोल ली। जंगल में मंगल हो गया, ऊसर में बाग़ लहराने लगा।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;यात्रियों का रातदिन तांता लगा रहता। शैनःशैनः ईसाई धर्म के परधान पदाधिकारी भी श्रद्घा के वशीभूत होकर आने लगे। ऐन्टियोक का परधान जो उस समय संयोग से मिस्त्र में था, अपने समस्त अनुयायियों के साथ आया। उसने पापनाशी के असाधारण तप की मुक्तकंठ से परशंसा की। मिस्त्र के अन्य उच्च महारथियों ने इस सम्मति का अनुमोदन किया। एफरायम और सिरापियन के अध्यक्षों ने यह बात सुनी तो उन्होंने पापनाशी के पास आकर उसके चरणों पर सिर झुकाया और पहले इस तपस्या के विरुद्ध जो विचार परकट किये थे उनके लिए लज्जित हुए और क्षमा मांगी। पापनाशी ने उत्तर दिया-'बन्धुओं, यथार्थ यह है कि मैं जो तपस्या कर रहा हूं वह केवल उन परलोभनों और दुरिच्छाओं के निवारण के लिए है जो सर्वत्र मुझे घेरे रहते हैं और जिनकी संख्या तथा शक्ति को देखकर मैं दहल उठता हूं। मनुष्य का बाह्यरूप बहुत ही सूक्ष्म और स्वल्प होता है। इस ऊंचे शिखर पर से मैं मनुष्यों की चींटियों के समान ज़मीन पर रेंगते देखता हूं। किन्तु मनुष्य को अन्दर से देखो तो यह अनन्त और अपार है। वह संसार के समाकार है क्योंकि संसार उसके अन्तर्गत है। मेरे सामने जो कुछ है-यह आश्रय, यह अतिथिशालाएं, नदी पर तैरने वाली नौकाएं, यह गराम खेत, वनउपवन, नदियां, नहरें, पर्वत, मरुस्थल वह उसकी तुलना नहीं कर सकते जो मुझमें है। मैं अपने विराट अन्तस्थल में असंख्य नगरों और सीमाशून्य पर्वतों को छिपाये हुए हूं, और इस विराट अन्तस्थल पर इच्छाएं उसी भांति आच्छादित हैं जैसे निशा पृथ्वी पर आच्छादित हो जाती है। मैं, केवल मैं, अविचार एक जगत् हूं।'&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;यात्रियों का रातदिन तांता लगा रहता। शैनःशैनः ईसाई धर्म के परधान पदाधिकारी भी श्रद्घा के वशीभूत होकर आने लगे। ऐन्टियोक का परधान जो उस समय संयोग से मिस्त्र में था, अपने समस्त अनुयायियों के साथ आया। उसने पापनाशी के असाधारण तप की मुक्तकंठ से परशंसा की। मिस्त्र के अन्य उच्च महारथियों ने इस सम्मति का अनुमोदन किया। एफरायम और सिरापियन के अध्यक्षों ने यह बात सुनी तो उन्होंने पापनाशी के पास आकर उसके चरणों पर सिर झुकाया और पहले इस तपस्या के विरुद्ध जो विचार परकट किये थे उनके लिए लज्जित हुए और क्षमा मांगी। पापनाशी ने उत्तर दिया-'बन्धुओं, यथार्थ यह है कि मैं जो तपस्या कर रहा हूं वह केवल उन परलोभनों और दुरिच्छाओं के निवारण के लिए है जो सर्वत्र मुझे घेरे रहते हैं और जिनकी संख्या तथा शक्ति को देखकर मैं दहल उठता हूं। मनुष्य का बाह्यरूप बहुत ही सूक्ष्म और स्वल्प होता है। इस ऊंचे शिखर पर से मैं मनुष्यों की चींटियों के समान ज़मीन पर रेंगते देखता हूं। किन्तु मनुष्य को अन्दर से देखो तो यह अनन्त और अपार है। वह संसार के समाकार है क्योंकि संसार उसके अन्तर्गत है। मेरे सामने जो कुछ है-यह आश्रय, यह अतिथिशालाएं, नदी पर तैरने वाली नौकाएं, यह गराम खेत, वनउपवन, नदियां, नहरें, पर्वत, मरुस्थल वह उसकी तुलना नहीं कर सकते जो मुझमें है। मैं अपने विराट अन्तस्थल में असंख्य नगरों और सीमाशून्य पर्वतों को छिपाये हुए हूं, और इस विराट अन्तस्थल पर इच्छाएं उसी भांति आच्छादित हैं जैसे निशा पृथ्वी पर आच्छादित हो जाती है। मैं, केवल मैं, अविचार एक जगत् हूं।'&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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		<author><name>आदित्य चौधरी</name></author>
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		<title>आदित्य चौधरी: Text replacement - &quot;आंखे&quot; to &quot;आँखें&quot;</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Text replacement - &amp;quot;आंखे&amp;quot; to &amp;quot;आँखें&amp;quot;&lt;/p&gt;
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		<author><name>आदित्य चौधरी</name></author>
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		<title>व्यवस्थापन: Text replacement - &quot;ईष्या&quot; to &quot;ईर्ष्या&quot;</title>
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		<updated>2018-04-07T13:35:28Z</updated>

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				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;13:35, 7 अप्रैल 2018 का अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot; id=&quot;mw-diff-left-l118&quot;&gt;पंक्ति 118:&lt;/td&gt;
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&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;थोड़े ही दिनों में उस असाधारण व्यक्ति की चचार गांवों में फैलने लगी और रविवार के दिन श्रमजीवियों के दलके-दल अपनी स्त्रियों और बच्चों के साथ उसके दर्शनार्थ आने लगे। पापनाशी के शिष्यों ने जब सुना कि गुरुजी ने इस विचित्र स्थान में शरण ली है तो वह चकित हुए, और उसकी सेवा में उपस्थित होकर उससे स्तम्भ के नीचे अपनी कुटिया बनाने की आज्ञा पराप्त की। नित्यपरति परातःकाल वह आकर अपने स्वामी के चारों ओर खड़े हो जाते और उसके सदुपदेश सुनते थे।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;थोड़े ही दिनों में उस असाधारण व्यक्ति की चचार गांवों में फैलने लगी और रविवार के दिन श्रमजीवियों के दलके-दल अपनी स्त्रियों और बच्चों के साथ उसके दर्शनार्थ आने लगे। पापनाशी के शिष्यों ने जब सुना कि गुरुजी ने इस विचित्र स्थान में शरण ली है तो वह चकित हुए, और उसकी सेवा में उपस्थित होकर उससे स्तम्भ के नीचे अपनी कुटिया बनाने की आज्ञा पराप्त की। नित्यपरति परातःकाल वह आकर अपने स्वामी के चारों ओर खड़े हो जाते और उसके सदुपदेश सुनते थे।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
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		<title>व्यवस्थापन: Text replacement - &quot;जरूर&quot; to &quot;ज़रूर&quot;</title>
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		<updated>2018-01-02T10:44:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Text replacement - &amp;quot;जरूर&amp;quot; to &amp;quot;ज़रूर&amp;quot;&lt;/p&gt;
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		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
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		<title>व्यवस्थापन: Text replacement - &quot;उच्छवास&quot; to &quot;उच्छ्वास&quot;</title>
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		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
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		<title>व्यवस्थापन: Text replacement - &quot; शृंगार &quot; to &quot; श्रृंगार &quot;</title>
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		<title>व्यवस्थापन: Text replacement - &quot;विद्वान &quot; to &quot;विद्वान् &quot;</title>
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		<updated>2017-07-06T14:55:48Z</updated>

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तुम मुझे भूल कैसे गये ? मुझे पहचाना क्यों नहीं ! इसी पर आत्मज्ञानी बनने का दावा करते हो ? मैं थायस के असंख्य अवतारों में से एक हूं। तुम &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;विद्वान &lt;/del&gt;हो और जीवों के तत्त्व को जानते हो। तुमने बड़ीबड़ी यात्राएं की हैं और यात्राओं ही से मनुष्य आदमी बनता है, उसके ज्ञान और बुर्द्धि का विकास होता है। यात्रा के दिनों में बहुधा इतनी नवीन वस्तुएं देखने में आ जाती हैं, जितनी घर पर बैठे हुए दस वर्ष में भी न आयेंगी। तुमने सुना है कि पूर्वकाल में थायस हेलेन के नाम से यूनान में रहती थी। उसने थीब्स में फिर दूसरा अवतार लिया। मैं ही थीब्स की थायस थी। इसका कारण क्या है कि तुम इतना भी न भांप सके। पहचानो, यह किसकी कबर है ? क्या तुम बिल्कुल भूल गये कि हमने कैसेकैसे विहार किये थे। जब मैं जीवित थी तो मैंने इस संसार के पापों का बड़ा भार अपने सिर पर लिया था और अब केवल छायामात्र रह जाने पर भी एक चित्र के रूप में भी, मुझमें इतनी समाथ्र्य है कि मैं तुम्हारे पापों को अपने ऊपर ले सकूं। हां, मुझमें इतनी सामथ्र्य है। जिसने जीवन में समस्त संसार के पापों का भार उठाया, क्या उसका चित्र अब एक पराणी के पापों को भार न उठा सकेगा। विस्मित क्यों होते हो? आश्चर्य की कोई बात नहीं। विधाता ही ने यह व्यवस्था कर दी कि तुम जहां जाओगे, थायस तुम्हारे साथ रहेगी। अब अपनी चिरसंगिनी थायस की क्यों अवहेलना करते हो ? तुम विधाता के नियम को नहीं तोड़ सकते।'&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;उस दिन से पापनाशी का चित्त आठों पहर चंचल रहने लगा। एक पल के लिए उसे शान्ति न मिलती। उस आवाज़ की अविश्रान्त ध्वनि उसके कानों में आया करती। सितार बजाने वाली युवती अपनी लम्बी पलकों के नीचे सक उसकी ओर टकटकी लगाये रहती। आखिर एक दिन वह भी बोली-'पापनाशी, इधर देख ! मैं कितनी मायाविनी और रूपवती हूं ! मुझे प्यार क्यों नहीं करता ? मेरे परेमालिंगन में उस परेमदाह को शान्त कर दे जो तुझे विकल कर रहा है। मुझसे तू व्यर्थ आशंकित है। तू मुझसे बच नहीं सकता, मेरे परेमपाशों से भाग नहीं सकता ! मैं नारी सौन्दर्य हूं। हतबुद्धि ! मूर्ख ! तू मुझसे कहां भाग जाने का विचार करता है ? तुझे कहां शरण मिलेगी ? तुझे सुन्दर पुष्पों की शोभा में, खजूर के वृक्षों के फूलों में, उसकी फलों से लदी हुई डालियों में, कबूतरों के पर में, मृगाओं की छलांगों में, जलपरपातों के मधुर कलरव में, चांद की मन्द ज्योत्स्ना में, तितलियों के मनोहर रंगों में, और यदि अपनी आंखें बंद कर लेगा, तो अपने अंतस्तल में, मेरा ही स्वरूप दिखाई देगा। मेरा सौंदर्य सर्वव्यापक है। एक हज़ार वर्षों से अधिक हुए कि उस पुरुष ने जो यहां महीन कफ़न में वेष्टित, एक काले पत्थर की शय्या पर विश्राम कर रहा है, मुझे अपने हृदय से लगाया था। एक हज़ार वर्षों से अधिक हुआ कि उसने मेरे सुधामय अधरों का अन्तिम बार रसास्वादन किया था और उसकी दीर्घ निद्रा अभी तक उसकी सुगन्ध से महक रही है। पापनाशी, तुम मुझे भलीभांति जानते हो ? तुम मुझे भूल कैसे गये ? मुझे पहचाना क्यों नहीं ! इसी पर आत्मज्ञानी बनने का दावा करते हो ? मैं थायस के असंख्य अवतारों में से एक हूं। तुम &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;विद्वान् &lt;/ins&gt;हो और जीवों के तत्त्व को जानते हो। तुमने बड़ीबड़ी यात्राएं की हैं और यात्राओं ही से मनुष्य आदमी बनता है, उसके ज्ञान और बुर्द्धि का विकास होता है। यात्रा के दिनों में बहुधा इतनी नवीन वस्तुएं देखने में आ जाती हैं, जितनी घर पर बैठे हुए दस वर्ष में भी न आयेंगी। तुमने सुना है कि पूर्वकाल में थायस हेलेन के नाम से यूनान में रहती थी। उसने थीब्स में फिर दूसरा अवतार लिया। मैं ही थीब्स की थायस थी। इसका कारण क्या है कि तुम इतना भी न भांप सके। पहचानो, यह किसकी कबर है ? 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तुमने उस कठिन समस्या का विचार नहीं किया। न ईश्वर ही ने उस पर विचार करने का कष्ट उठाया। तुमसे कोई परदा नहीं। हम तुम दोनों एक ही हैं ईश्वर बहुत विचारशील नहीं जान पड़ता। कोई साधारण जादूगर उसे धोखें में डाल सकता है; और यदि उसके पास आकाश, वजर और मेघों की जलसेना न होती तो देहाती लौंडे उसकी दा़ी नोचकर भाग जाते, उससे कोई भयभीत न होता, और उसकी विस्तृत सृष्टि का अन्त हो जाता। यथार्थ में उसका पुराना शत्रु सर्प उससे कहीं चतुर और दूरदर्शी है। सर्पराज के कौशल का पारावार नहीं है। यह कलाओं में परवीण हैं यदि मैं ऐसी सुन्दरी हूं तो इसका कारण यह है कि उसने मुझे अपने ही हाथों से रचा और यह शोभा परदान की। उसी ने मुझे बालों का गूंथना, अर्धकुसुमित अधरों से हंसना और आभूषणों से अंगों को सजाना सिखाया। तुम अभी तक उसका माहात्म्य नहीं जानते। जब तुम पहली बार इस कबर में आये तो तुमने अपने पैरों से उन सर्पों को भगा दिया जो यहां रहते थे और उनके अंडों को कुचल डाला। तुम्हें इसकी लेशमात्र भी चिन्ता न हुई कि यह सर्पराज के आत्मीय हैं। मित्र, मुझे भय है कि इस अविचार का तुमको कड़ा दंड मिलेगा। सर्पराज तुमसे बदला लिये बिना न रहेगा। तिस पर भी तुम इतना तो जानते ही थे कि वह संगीत में निपुण और परेमकला में सिद्धहस्त है। तुमने यह जानकर भी उसकी अवज्ञा की। कला और सौन्दर्य दोनों ही से झगड़ा कर बैठे, दोनों को ही पांव तले कुचलने की चेष्टा की। और अब तुम दैहिक और मानसिक आतंकों से गरस्त हो रहे हो। तुम्हारा ईश्वर क्यों तुम्हारी सहायता नहीं करता ? उसके लिए यह असम्भव है। उसका आकार भूमंडल के आकार के समान ही है, इसलिए उसे चलने की जगह ही कहां है, और अगर असम्भव को सम्भव मान लें, तो उसकी भूमंडलव्यापी देह के किंचितमात्र हिलने पर सारी सृष्टि अपनी जगह से खिसक जायेगी, संसार का नाम ही न रहेगा। तुम्हारे सर्वज्ञाता ईश्वर ने अपनी सृष्टि में अपने को कैद कर रखा है।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;पापनाशी ने पत्थर के फर्श पर अपना सिर पटक दिया और भयभीत होकर चीख उठा। अब यह सितारवादिनी नित्यपरति दीवार से न जाने किस तरह अलग होकर उसके समीप आ जाती और मन्दश्वास लेते हुए उससे स्पष्ट शब्दों में वार्तालाप करती। और जब वह विरक्त पराणी उसकी क्षुब्ध चेष्टाओं का बहिष्कार करता तो वह उससे कहती-'पिरयतम! मुझे प्यार क्यों नहीं करते ? मुझसे इतनी निठुराई क्यों करते हो ? जब तक तुम मुझसे दूर भागते रहोगे, मैं तुम्हें विकल करती रहूंगी, तुम्हें यातनाएं देती रहूंगी। तुम्हें अभी यह नहीं मालूम है कि मृत स्त्री की आत्मा कितनी धैर्यशालिनी होती है। अगर आवश्यकता हो तो मैं उस समय तक तुम्हारा इन्तजार करुंगी जब तक तुम मर न जाओगे। मरने के बाद भी मैं तुम्हारा पीछा न छोडूंगी। मैं जादूगरनी हूं, मुझे मंत्रों का बहुत अभ्यास है। मैं तुम्हारी मृतदेह में नया जीव डाल दूंगी। जो उसे चैतन्य कर देगा और जो मुझे वह वस्तु परदान करके अपने को धन्य मानेगा जो मैं तुमसे मांगतेमांगते हार गयी और न पा सकी ! मैं उस पुनजीर्वित शरीर के साथ मनमाना सुखभोग करुंगी। और पिरय पापनाशी, सोचो, तुम्हारी दशा कितनी करुणाजनक होगी जब तुम्हारी स्वर्गवासिनी आत्मा उस ऊंचे स्थान पर बैठे हुए देखेगी कि मेरी ही देह की क्या छीछालेदर हो रही है। स्वयं ईश्वर जिसने हिसाब के दिन के बाद तुम्हें अनन्तकाल तक के लिए यह देह लौटा देने का वचन दिया है चक्कर में पड़ जायेगा कि क्या करुं। वह उस मानव शरीर को स्वर्ग के पवित्र धाम में कैसे स्थान देगा जिसमें एक परेत का निवास है और जिससे एक जादूगरनी की माया लिपटी हुई है ? 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		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
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		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
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