सुभद्रा

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अर्जुन-सुभद्रा विवाह

श्रीमद्भागवत में

अर्जुन तीर्थ-यात्रा करता हुआ प्रभास-क्षेत्र पहुंचा। वहां उसने सुना कि बलराम अपनी बहन सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से करना चाहता है किंतु कृष्ण, वसुदेव तथा देवकी सहमत नहीं हैं। अर्जुन एक त्रिदंडी वैष्णव का रूप धारण करके द्वारका पहुंचा। बलराम ने उसका विशेष स्वागत किया। भोजन करते समय उसने और सुभद्रा ने एक-दूसरे को देखा तथा परस्पर विवाह करने के लिए इच्छुक हो उठे। एक बार सुभद्रा देव-दर्शन के लिए रथ पर सवार होकर द्वारका दुर्ग से बाहर निकली। सुअवसर देखकर अर्जुन ने उसका हरण कर लिया। उसे कृष्ण, वसुदेव तथा देवकी की सहमति पहले से ही प्राप्त थी। बलराम को उनके संबंधियों ने बाद में समझा-बुझाकर शांत कर दिया।[2]


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. महाभारत, आदिपर्व, अ0 217-220
  2. श्रीमद् भागवत, 10।86।1-12

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