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मनुस्मृति

भारत में वेदों के उपरान्त सर्वाधिक मान्यता और प्रचलन ‘मनुस्मृति’ का ही है । इसमें चारों वर्णों, चारों आश्रमों, सोलह संस्कारों तथा सृष्टि उत्पत्ति के अतिरिक्त राज्य की व्यवस्था, राजा के कर्तव्य, भांति-भांति के विवादों, सेना का प्रबन्ध आदि उन सभी विषयों पर परामर्श दिया गया है जो कि मानव मात्र के जीवन में घटित होने सम्भव हैं यह सब धर्म-व्यवस्था वेद पर आधारित है। उसके उपरान्त इसके इतने संस्करण प्रकाशित हुए कि उनका नाम देना सम्भव नहीं है। इस ग्रंथ में निर्णयसागर के संस्करण एवं कुल्लूकभट्ट की टीका का उपयोग हुआ है। मनुस्मृति का अंग्रेज़ी अनुवाद कई बार हो चुका है। डॉ. बुहलर का अनुवाद सर्वश्रेष्ठ है। उन्होंने एक विद्वत्तापूर्ण भूमिका में कतिपय समस्याओं का उद्घाटन भी किया है।

रचना काल

मनुस्मृति का रचना काल ई.पू. एक हज़ार वर्ष से लेकर ई.पू. दूसरी शताब्दी तक माना जाता है। इसकी रचना के संबंध में कहा गया है कि धर्म, वर्ण और आश्रमों के विषय में ज्ञान प्राप्ति की इच्छा से ऋषिगण स्वायंभुव मनु के समक्ष उपस्थित हुए। मनु ने उनको कुछ ज्ञान देने के बाद कहा कि मैंने यह ज्ञान ब्रह्मा से प्राप्त किया था और मरीचि आदि मुनियों को पढ़ा दिया। ये भृगु (जो वहां उपस्थित थे) मुझसे सब विषयों को अच्छी तरह पढ़ चुके हैं और अब ये आप लोगों को बताएंगे। इस पर भृगु ने मनु की उपस्थिति में, उनका बताया ज्ञान, उन्हीं की शब्दावली में अन्यों को दिया। यही ज्ञान गुरु-शिष्य परंपरा में 'मनुस्मृति' या 'मनु-संहिता' के नाम से प्रचलित हुआ। भारत में मनुस्मृति का सर्वप्रथम मुद्रण 1813 ई. में कलकत्ता में हुआ था। 2694 श्लोकों का यह ग्रंथ 12 अध्यायों में विभक्त है। विभिन्न अध्यायों के वर्ण्य-विषय इस प्रकार हैं-

  1. वर्णाश्रम धर्म की शिक्षा,
  2. धर्म की परिभाषा,
  3. ब्रह्मचर्य, विवाह के प्रकार आदि,
  4. गृहस्थ जीवन,
  5. खाद्य-अखाद्य विचार तथा जन्म-मरण, अशौच और शुद्धि,
  6. वानप्रस्थ जीवन,
  7. राजधर्म और दंड,
  8. न्याय शासन,
  9. पति-पत्नी के कर्त्तव्य,
  10. चारों वर्णों के अधिकार और कर्त्तव्य,
  11. दान-स्तुति,प्रायश्चित्त आदि तथा
  12. कर्म पर विवेचन और ब्रह्म की प्राप्ति।

आस्तिक हिंदुओं के कार्य-व्यवहार का आधार दीर्घकाल तक मनुस्मृति रही हैं। इसका प्रभाव न्याय प्रणाली पर भी पड़ा है। मनु ने जन्म से लेकर मृत्यु तक का मनुष्य का पूरा कार्यक्रम प्रस्तुत किया है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ये चार पुरुषार्थ; देव, ऋषि और पितृ ये तीन ऋण; सोलह संस्कार, पांच महायज्ञ; चार आश्रम और चार वर्ण सभी का इसमें विवेचन है।

हिन्दू ग्रंथ

यह हिन्दू धर्म का सबसे प्रधान हिन्दू-ग्रंथ है। इसके रचयिता के विषय में मतभेद है। कुछ का मत है कि पहले एक 'मानव धर्मशास्त्र' था जो अब उपलब्ध नहीं है। अत: वर्तमान 'मनुस्मृति' को मनु के नाम से प्रचारित करके उसे प्रामाणिकता प्रदान की गई है। परंतु बहुमत इसे स्वीकार नहीं करता। महाभारत, रामायण, तैत्तिरीय-संहिता, ऐतरेय ब्राह्मण तथा शतपथ ब्राह्मण तथा नारद-संहिता में मनु और 'मनुस्मृति' का उल्लेख इसकी प्राचीनता का पुष्ट प्रमाण है। भारतीय वांडमय में 14 मनु वर्णित हैं। निरुक्त में भी मनु स्वायंभुव के मत की चर्चा हुई है। अत: यास्क के पूर्व पद्यबद्ध स्मृतियाँ थीं और मनु एक व्यवहार-प्रणेता थे। गौतम, वसिष्ठ, आपस्तम्ब ने मनु का उल्लेख किया है। महाभारत में मनु को कभी केवल मनु, कभी स्वायंभुव मनु[1] और कभी प्राचेतस मनु[2] कहा गया है। सर्वप्रथम मनु 'स्वयंभुव' मनु थे। वर्तमान मन्वंतर (मनुओ के अनुसार काल विभाजन) जिस मनु के नाम से है वे वैवस्वत मनु। तैत्तिरीय संहिता तथा ऐतरेय ब्राह्मण में मनु के विषय में एक गाथा है, जिसमें उन्होंने अपनी सम्पत्ति को अपने पुत्रों में बाँटा है और अपने पुत्र नाभानेदिष्ठ को कुछ नहीं दिया है।

ऋग्वेद के अनुसार

ऋग्वेद में मनु को मानव-जाति का पिता कहा गया है।[3] एक वैदिक कवि ने स्तुति की है ताकि वह मनु के मार्ग से च्युत न हो जाय।[4] एक कवि ने कहा है कि मनु ने जो कुछ कहा है, औषध है।[5] प्रथम में 'मानव्यो हि प्रजा:' कहा गया है।

शतपथ ब्राह्मण के अनुसार

शतपथ ब्राह्मण में मनु और प्रलय की कहानी है। शान्तिपर्व[6] में आया है कि किस प्रकार भगवान् ब्रह्मा ने एक सौ सहस्त्र श्लोकों में धर्म पर लिखा, किस प्रकार मनु ने उन धर्मों को उद्घोषित किया और किस प्रकार उशना तथा बृहस्पति ने मनु स्वायंभुव के ग्रन्थ के आधार पर शास्त्रों का प्रणयन किया। महाभारत में एक स्थान पर विवरण कुछ भिन्न है और वहाँ मनु का नाम नहीं आया है। शान्तिपर्व[7] ने बताया है कि किस प्रकार ब्रह्मा ने धर्म, अर्थ एवं काम पर एक लाख अध्याय लिखे और वह महाग्रन्थ कालान्तर में विशालाक्ष, इन्द्र, बाहुदन्तक, बृहस्पति एवं काव्य (उशना) द्वारा क्रम से 10,000, 5,000, 3,000 एवं 1,000 अध्यायों में संक्षिप्त किया गया।

नारद-स्मृति के अनुसार

नारद-स्मृति में आया है कि मनु ने 1,00,000 श्लोकों, 1080 अध्यायों एवं 24 प्रकरणों में एक धर्मशास्त्र लिखा और उसे नारद को पढ़ाया, जिसने उसे 12,000 श्लोकों में संक्षिप्त किया और मार्कण्डेय को पढ़ाया। मार्कण्डेय ने भी इसे 8,000 श्लोकों में संक्षिप्त कर सुमति भार्गव को दिया, जिन्होंने स्वयं उसे 4,000 श्लोकों में संक्षिप्त किया। वर्तमान मनुस्मृति में आया है[8] कि ब्रह्मा से विराट् की उद्भूति हुई, जिन्होंने मनु को उत्पन्न किया, जिनसे भृगु, नारद आदि ऋषि उत्पन्न हुए; ब्रह्मा ने मनु को शास्त्राध्ययन कराया, मनु ने दस ऋषियों[9] को वह ज्ञान दिया; कुछ बड़े ऋषि मनु के यहाँ गये और वर्णों एवं मध्यम जातियों के धर्मो (कर्तव्यों) को पढ़ाने के लिए उनसे प्रार्थना की और मनु ने कहा कि यह कार्य उनके शिष्य भृगु करेंगे।[10] मनुस्मृति में यह पढ़ाने की बात आरम्भ से अन्त तक है और स्थान-स्थान पर ऋषि लोग भृगु के व्याख्यान को रोककर उनसे कठिन बातें समझ लेते हैं।[11] मनु सर्वत्र विराजमान हैं; उनका नाम 'मनुराह'[12] या 'मनुरब्रवीत्' या 'मरोरनुशासनम्'[13] के रूप में दर्जनों बार आया है।

भविष्य पुराण के अनुसार

भविष्य पुराण के अनुसार, जैसा कि हमें हेमाद्रि, संस्कारमयूख तथा अन्य ग्रन्थों से पता चलता है, स्वायंभुव-शास्त्र के चार संस्करण थे, जो भृगु, नारद, बृहस्पति एवं अंगिरा द्वारा प्रणीत थे।[14] अति प्राचीन लेखक विश्वरूप ने मनुस्मृति के उद्धरण दिये हैं और वहाँ मनु स्वयंभू कहे गये हैं।[15] किन्तु विश्वरूप दारा उद्धृत भृगु की बातें मनुस्मृति में नहीं पायी जातीं। इसी प्रकार अपरार्क द्वारा उद्धृत भृगु की बातें भी मनुस्मृति में नहीं पायी जातीं।

धर्मशास्त्र एवं अर्थशास्त्र

मनुस्मृति का प्रणेयन किसने किया, यह कहना कठिन है। यह सत्य है कि मानव के आदि पूर्वज मनु ने इसका प्रणयन नहीं किया है। इसके प्रणेता ने अपना नाम क्यों छिपा रखा, यह कहना दुष्कर ही है। हो सकता है कि इस महान् ग्रन्थ को प्राचीनता एवं प्रामाणिकता देने के लिए ही इसे मनुकृत कहा गया है। मैक्समूलर के साथ डॉ. बुहलर ने यही प्रमाणित करने का प्रयत्न किया है कि मानव-चरण के धर्मसूत्र का संशोधित रूप ही मनुस्मृति है। किन्तु सम्भवत: मानव धर्मसूत्र नामक ग्रन्थ कभी विद्यमान ही नहीं था।[16] महाभारत ने स्वायंभुव मनु एवं प्राचेतस मनु में अन्तर बताया है, जिनमें प्रथम धर्मशास्त्रकार एवं दूसरे अर्थशास्त्रकार कहे गये हैं। कहीं-कहीं केवल मनु राजधर्म या अर्थविद्या के प्रणेता कहे गये हैं। हो सकता है, आरम्भ में मनु के नाम से दो ग्रन्थ रहे होंगे। जब कौटिल्य 'मानवों' की ओर संकेत करते हैं तो वहाँ सम्भवत: वे प्राचेतस मनु की बात उठाते हैं।

चाहे जो हो, यह कल्पना करना असंगत नहीं है कि मनुस्मृति के लेखक ने मनु के नाम वाले धर्मशास्त्र एवं अर्थशास्त्र की बातों को ले लिया। यह बात सम्भवत: कौटिल्य को ज्ञात नहीं थी, क्योंकि सम्भवत: तब तक यह संशोधन-सम्पादन नहीं हो सका था, या हुआ भी रहा होगा तो कौटिल्य को इसकी सूचना नहीं थी। वर्तमान मनुस्मृति में इसके लेखक को स्वायंभुव मनु कहा गया है, जिनके अतिरिक्त छ: अन्य मनुओं की चर्चा की गयी है, जिनमें प्राचेतस की गणना नहीं हुई है।

शैली

वर्तमान मनुस्मृति में 12 अध्याय एवं 2694 श्लोक हैं। मनुस्मृति सरल एवं धाराप्रवाह शैली में प्रणीत है। इसका व्याकरण अधिकांश में पाणिनि-सम्मत है। इसके सिद्धान्त गौतम, बौधायन एवं आपस्तम्ब के धर्मसूत्रों से बहुत-कुछ मिलते-जुलते हैं। इसके बहुत-से श्लोक वासिष्ठ एवं विष्णु के धर्मसूत्रों में भी पाये जाते हैं। भाषा एवं सिद्धान्तों में मनुस्मृति एवं कौटिलीय में बहुत-कुछ समानता है।[17]

सूची

मनुस्मृति की विषय-सूची यह है--

  • वर्णधर्म की शिक्षा के लिए ऋषिगण मनु के पास जाते हैं; मनु बहुत कुछ सांख्य मत के अनुसार आत्मरूप से स्थित भगवान् से विश्व-सृष्टि का विवरण देते हैं; विराट् की उत्पत्ति, विराट् से मनु, मनु से दस ऋषियों की सृष्टि हुई; भाँति-भाँति के जीव, यथा- मनुष्य, पशु, पक्षी आदि की सृष्टि; ब्रह्मा वे धर्म-शिक्षा मनु को दी, मनु ने ऋषियों को शिक्षित किया; मनु ने भृगु को ऋषियों को धर्म की शिक्षा देने का आदेश दिया; स्वायंभुव मनु से छ: अन्य मनु उत्पन्न हुए; निमेष से वर्ष तक की काल इकाइयाँ, चारों युग एवं उनके सन्ध्या-प्रकाश; एक सहस्त्र युग ब्रह्मा के एक दिन के बराबर हैं; मन्वन्तर, प्रलय का विस्तार; चारों युगों में क्रमश: धर्मावनति; चारों युगों में विभिन्न धर्म एवं लक्ष्य; चारों वर्णों के विशेषाधिकार एवं कर्तव्य; ब्राह्मणों एवं मनु के शास्त्र की स्तुति; आचार परमोच्च धर्म है; सम्पूर्ण शास्त्र की विषयसूची;
  • धर्म-परिभाषा; धर्म के उपादान हैं वेद, स्मृति, भद्र लोगों का आचार, आत्मतुष्टि; इस शास्त्र के लिए किसका अधिकार है; ब्रह्मावर्त, ब्रह्मर्षिदेश, मध्यदेश, आर्यावर्त की सीमाएँ; संस्कार क्यों आवश्यक हैं; ऐसे संस्कार, यथा- जातकर्म, नामधेय, चूड़ाकर्म, उपनयन; वर्णों के उपनयन का उचित काल, उचित मेखला, पवित्र जनेऊ, तीन वर्णों के ब्रह्मचारियों के लिए दण्ड, मृगछाला, ब्रह्मचारी के कर्तव्य एवं आचरण;
  • 36, 18 एवं 9 वर्षों का ब्रह्मचर्य; समावर्तन, विवाह; विवाहयोग्य लड़की; ब्राह्मण चारों वर्णों की लड़कियों से विवाह कर सकता है; आठ प्रकार के विवाहों की परिभाषा, किस जाति के लिए कौन विवाह उपयुक्त है, पति-पत्नी के कर्तव्य; नारी-स्तुति, पंचाह्निक; गृहस्थ-जीवन की प्रशंसा, अतिथि-सत्कार, मधुपर्क; श्राद्ध, श्राद्ध में कौन निमन्त्रित नहीं होते;
  • गृहस्थ की जीवन-विधि एवं वृत्ति; स्नातक-आचार-विधि, अनध्याय-नियम; वर्जित एवं अवर्जित भोज्य एवं पेय के लिए नियम;
  • कौन-से मांस एवं तरकारियाँ खानी चाहिए; जन्म-मरण पर अशुद्धिकाल, सपिण्ड एवं समानोदक की परिभाषा; विभिन्न प्रकार से विंभिन्न वस्तुओं के स्पर्श से पवित्रीकरण, पत्नी एवं विधवा के कर्तव्य;
  • वानप्रस्थ होने का काल, उसकी जीवनचर्या, परिव्राजक एवं उसके कर्तव्य; गृहस्थ-स्तुति:
  • राजधर्म, दण्ड-स्तुति, राजा के लिए चार विद्याएँ, काम से उत्पन्न राजा के दस अवगुण एवं क्रोध से उत्पन्न आठ अवगुण (दोष); मन्त्रि-परिषद की रचना, दूत के गुण (पात्रता), दुर्ग एवं राजधानी, पुरुष एवं विविध विभागों के अध्यक्ष; युद्ध-नियम; साम.दान, भेद एवं दण्ड नामक चार साधन; ग्राममुखिया से ऊपर वाले राज्याधिकारी; कर-नियम; बारह राजाओं के मण्डल की रचना; छ: गुण- संधि, युद्ध-स्थिति , शत्रु पर आक्रमण, आसन, शरण लेना एवं द्वैध; विजयी के कर्तव्य;
  • न्यायशासन-सम्बन्धी राजा के कर्तव्य ; व्यवहारों के 18 नाम, राजा एवं न्यायाधीश, अन्य न्यायाधीश; सभा; सभा-रचना; नाबालिगों, विधवाओं, असहाय लोगों, कोष आदि को दने के लिए राजा का धर्म; चोरी गये हुए धन का पता लगाने में राजा का कर्तव्य; दिये हुए ऋण को प्राप्त करने के लिए ऋणदाता के साधन; स्थितियाँ जिनके कारण अधिकारी मुक़दमा हार जाता है, साक्षियों की पात्रता, साक्ष्य के लिए अयोग्य व्यक्ति, शपथ, झूठी गवाही के लिए अर्थ-दण्ड, शारीरिक दण्ड के ढंग, शारीरिक दण्ड से ब्राह्मणों को छुटकारा; तौल एवं तटखरे; न्यूनतम, मध्यम एवं अधिकतम अर्थ-दण्ड; ब्याज-दर, प्रतिज्ञाएँ, प्रतिकूल (बिपक्षी के) अधिकार से प्रतिज्ञा, सीमा, नाबालिग की भूमि-सम्पत्ति, धन-संग्रह, राजा की सम्पत्ति आदि पर प्रभाव नहीं पड़ता; दामदुपट का नियम; बन्धक; पिता के कौन-से ऋण पुत्र नहीं देगा; सभी लेन-देन को कपटाचार एवं बलप्रयोग नष्ट कर देता है; जो स्वामी नहीं है उसके द्वारा विक्रय; स्वत्व एवं अधिकार; साक्षा; प्रत्यादान; मज़दूरी का न देना; परम्पराविरोध; विक्रय-विलोप; स्वामी एवं गोरक्षक के बीच का झगड़ा , गाँव के इर्द-गिर्द के चरागाह; सीमा-संघर्ष गालियाँ (अपशब्द), अपवाद एवं पिशुन-वचन; आक्रमण, मर्दन एवं कुचेष्टज्ञ; पृष्ठभाग पर कोड़ा मारना; चोरी, साहस (यथा हत्या, डकैती आदि के कार्य); स्वरक्षा का अधिकार; ब्राह्मण कब मारा जा सकता है; व्यभिचार एवं बलात्कार, ब्राह्मण के लिए मृत्यु-दण्ड नहीं, प्रत्युत देश-निकाला; माता-पिता, पत्नी, बच्चे कभी भी त्याज्य नहीं हैं; चुंगियाँ एवं एकाधिकार; दासों के सात प्रकार,
  • पति-पत्नी के न्याय्य (व्यवहारानुकूल) कर्तव्य, स्त्रियों की भर्त्सना, पातिव्रत की स्तुति; बच्चा किसको मिलना चाहिए, जनक को या जिसकी पत्नी से वह उत्पन्न हुआ है; नियोग का विवरण एवं उसकी भर्त्सना; प्रथम पत्नी का कब अतिक्रमण किया जा सकता है; विवाह की अवस्था; बँटवारा, इसकी अवधि, ज्येष्ठ पुत्र का विशेष भाग; पुत्रिका, पुत्री का पुत्र, गोद का पुत्र, शूद्र पत्नी सपिण्ड उत्तराधिकार पाता है; सकुल्य, गुरु एवं शिष्य उत्तराधिकारी के रूप में; ब्राह्मण के धन को छोड़कर अन्य किसी के धन का अन्तिम उत्तराधिकारी राजा है; स्त्रीधन के प्रकार; स्त्रीधन का उत्तराधिकार; बसीयत से हटाने के कारण; किस सम्पात्ति का बँटवारा नहीं होता; विद्या के लाभ, पुनर्मिलन; माता एवं पितामह उत्तराधिकारी के रूप में; बाँट दी जानेवाली सम्पत्ति; जुआ एवं पुरस्कार, ये राजा द्वारा बन्द कर दिये जाने चाहिए; पंच महापाप, उनके लिए प्रायश्चित्त; ज्ञात एवं अज्ञात (गुप्त) चोर; बन्दीगृह; राज्य के सात अंग; वैश्य एवं शूद्र के कर्तव्य;
  • केवल ब्राह्मण ही पढ़ा सकता है; मिश्रित जातियाँ; म्लेच्छ, कम्बोज, यवन, शक, सबके लिए आचार-नियम; चारों वर्णों के विशेषाधिकार एवं कर्तव्य, विपर्ति में ब्राह्मण की वृत्ति के साधन; ब्राह्मण कौन-से पदार्थ न पदार्थ न विक्रय करे; जीविका-प्राप्ति एवं उसके साधन के सात उचित ढंग;
  • दान-स्तुति; प्रायश्चित्त् के बारे में विविध मत; बहुत-से देखे हुए प्रतिफल; पूर्वजन्म के पाप के कारण रोग एवं शरीर-दोष; पंच नैतिक पाप एवं उनके लिए प्रायश्चित्त; उपपातक और उनके लिए प्रायश्चित्त; सान्तयन, पराक, चान्द्रायण जैसे प्रायश्चित्त; पापनाशक पवित्र मन्त्र;
  • कर्म पर विवेचन; क्षेत्रज्ञ, भूतात्मा, जीव; नरक-कष्ट; सत्त्व, रजस् एवं तमस् नामक तीन गुण; नि:श्रैयस की उत्पत्ति किससे होती है; आनन्द का सर्वोच्च साधन है आत्म-ज्ञान; प्रवृत्त एवं निवृत्त कर्म; फलप्राप्ति की इच्छा से रहित होकर जो कर्म किया जाय वही निवृत्त है; वेद-स्तुति; तर्क का स्थान; शिष्ट एवं परिषद्; मानव शास्त्र के अध्ययन का फल।

साहित्य

मनु को अपने पूर्व के साहित्य का पर्याप्त ज्ञान था। उन्होंने तीन वेदों के नाम लिये हैं और अथर्ववेद को अथर्वागिरसी श्रुति[18] कहा है। मनुस्मृति में आरण्यक, छ: वेदांगों, धर्मशास्त्रों की चर्चा आयी है। मनु ने अत्रि, उतथ्यपुत्र (गौतम), भृगु शौन्क, वसिष्ठ, वैखानस आदि धर्मशास्त्रकारों का उल्लेख किया है। उन्होंने आख्याना, इतिहास, पुराण एवं खिलों का उल्लेख किया है। मनु ने वेदान्त की भाँति ब्रह्म का वर्णन किया है; लेकिन यहाँ यह भी कल्पना की जा सकती है कि उन्होंने उपनिषद की ओर संकेत किया है। उन्होंने 'वेदवाह्या: स्मृतय: की चर्चा करके मानो यह दर्शाया है कि उन्हें विरोधी पुस्तकों का पता था। हो सकता है कि ऐसा लिखकर उन्होंने बौद्धों, जैनों आदि की ओर संकेत किया है। उन्होंने धर्म-विरोधियों और उनकी व्यावसायिक श्रेणियों का उल्लेख किया है। उन्होंने आस्तिकता एवं वेदों की निन्दा कि ओर भी संकेत किया है और बहुत प्रकार की बोलियों की चर्चा की है। उन्होंने 'केचित्', 'अपरे', 'अन्ये' कहकर अन्य लेखकों के मत का उद्घाटन किया है। बुहलर का कथन है कि पहले एक मानवधर्मसूत्र था, जिसका रूपान्तर मनुस्मृति में हुआ है। किन्तु, वास्तव में यह एक कोरी कल्पना है, क्योंकि मानवधर्मसूत्र था ही नहीं।

आन्तरिक एवं बाह्य

अब हम आन्तरिक एवं बाह्य साक्षियों के आधार पर मनुस्मृति के काल-निर्णय का प्रयत्न करेंगे। प्रथमत: हम बाह्म साक्षियाँ लेते हैं। मनुस्मृति की सबसे प्राचीन टीका मेघातिथि की है, जिसका काल है 900 ई.। याज्ञवल्क्यस्मृति के व्याख्याकार विश्वरूप ने मनुस्मृति के जो लगभग 200 श्लोक उद्धृत किये किये हैं, वे सब बारहों अध्यायों के हैं। दोनों व्याख्याकारों ने वर्तमान मनुस्मृति से ही उद्धरण लिये हैं। वेदान्तसूत्र के भाष्य में शंकराचार्य ने कहा है। कुमारिल के तन्त्रवार्तिक में मनुस्मृति को सभी स्मृतियों से और गौतम धर्मसूत्र से भी प्राचीन कहा है। मृच्छकटिक[19] ने पापी ब्राह्मण के दण्ड के विषय में मनु का हवाला दिया है, और कहा है कि पापी ब्राह्मण को मृत्यु-दण्ड न देकर देश-निष्कासन-दण्ड देना चाहिए। वलभीराज घारसेन के एक अभिलेख से पता चलता है कि सन् 571 ई. में वर्तमान मनुस्मृति उपस्थित थी। जैमिनि सूत्र के भाष्यकार शबरस्वामी ने भी, जो 500 ई. के बाद के नहीं हो सकते, प्रत्युत पहले के ही हो सकते हैं, मनुस्मृति को उद्धृत किया है। अपरार्क एवं कुल्लूक ने भविष्य पुराण द्वारा उद्धृत मनुस्मृति के श्लोकों की चर्चा की है। बृहस्पति ने, जिनका काल है 500 ई., मनुस्मृति की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। बृहस्पति ने जो कुछ उद्धृत किया है वह वर्तमान मनुस्मृति में पाया जाता है। स्मृतिचन्द्रिका में उल्लिखित अड्गिरा ने मनु के धर्मशास्त्र की चर्चा की है। अश्वघोष की वज्रसूचिकोपनिषद में मानव धर्म के कुछ ऐसे उद्धरण हैं जो वर्तमान मनुस्मृति में पाये जाते हैं, कुछ ऐसे भी है, जो नहीं मिलते। रामायण में वर्तमान मनुस्मृति की बातें पायी जाती हैं। उपर्युक्त बाह्य साक्षियों से स्पष्ट है कि द्वितीय शताब्दी के बाद के अधिकतर लेखकों ने मनुस्मृति की प्रामाणिक ग्रन्थ माना है।

संशोधन

क्या मनुस्मृति के कई संशोधन हुए है? सम्भवत: नहीं। नारदस्मृति में जो यह आया है कि मनु का शास्त्र नारद, मार्कण्डेय एवं सुमति भार्गव द्वारा संक्षिप्त किया गया; भ्रामक उक्ति है, वास्तव में ऐसा कहकर नारद ने अपनी महत्ता गायी है। अब हम कुछ आन्तरिक साक्षियों की ओर भी संकेत कर लें।

न्याय-विधि

वर्तमान मनुस्मृति याज्ञवल्क्य से बहुत प्राचीन है, क्योंकि मनुस्मृति में न्याय-विधि-सम्बन्धी बातें अपूर्ण हैं और याज्ञवल्क्यस्मृति इस बात में बहुत पूर्ण है। याज्ञवल्क्य की तिथि कम-से-कम तीसरी शताब्दी है। अत: मनुस्मृति को इससे बहुत पहले रचा जाना चाहिए। मनु ने यवनों, कम्बोजों, शकों, पहलवों एवं चीनों के नाम लिये हैं, अतएव वे ई. पू. तीसरी शताब्दी से बहुत पहले नहीं हो सकते। यवन, काम्बोज एवं गान्धार लोगों का वर्णन अशोक के पाँचवें प्रस्तर-अनुशासन में आ चुका है। वर्त्तमान मनुस्मृति गठन एवं सिद्धान्तों में प्राचीन धर्मसूत्रों, अर्थात् गौतम, बौधायन एवं आपस्तम्ब के धर्मसूत्रों से बहुत आगे है। अत: निस्सन्देह इसकी रचना धर्मसूत्रों के उपरान्त हुई है। अत: स्पष्ट है कि मनुस्मृति की रचना ई. पू. दूसरी शताब्दी तथा ईसा के उपरान्त दूसरी शताब्दी के बीच कभी हुई होगी। संशोधित एवं परिवर्धित मनुस्मृति की रचना कब हुई, इस प्रश्न का उत्तर मनुस्मृति एवं महाभारत के पारस्परिक सम्बन्ध के ज्ञान पर निर्भर रहता है। श्री वी0 एन0 माण्डलिक ने कहा है कि मनुस्मृति ने महाभारत का भावांश लिया है। बुहलर ने बड़ी छानवीन के उपरान्त यह उद्घोषित किया है कि महाभारत के बारहवें एवं तेरहवें पर्वों को किसी मानव धर्मशास्त्र का ज्ञान था और यह मानव धर्मशास्त्र आज की मनुस्मृति से गहरे रूप में सम्बन्धित लगता है। किन्तु यहाँ बुहलर ने महाभारत के साथ अपना पक्षपात ही प्रकट किया है। हाप्किन ने यह कहा है कि महाभारत के तेरहवें अध्याय में वर्तमान मनुस्मृति की चर्चा है। मनुस्मृति में बहुत-से ऐतिहासिक नाम आये हैं, यथा- अंगिरा, अगस्त्य, वेन, नहुष, सुदास, पैजवन, निमि, पृथु, मनु, कुबेर, गाधिपुत्र विश्वामित्र, वसिष्ठ, वत्स, अक्षमा, सारङ्गी, दक्ष, अजीगर्त, वामदेव, भरद्वाज। इनमें बहुत-से नाम वैदिक परम्परा के भी हैं।

मनुस्मृति ने यह नहीं कहा है कि ये नाम महाभारत के हैं। महाभारत में 'मनुरब्रवीत्' , 'मनुराजधर्मा;', 'मनुशास्त्र' जैसे शब्द आये हैं, जिनमें कुछ उद्धरण आज की मनुस्मृति में पाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त महाभारत के बहुत-से श्लोक मनुस्मृति से मिलते हैं, यद्यपि वहाँ यह नहीं कहा गया है कि वे मनु से लिये गये हैं। इससे स्पष्ट है कि मनुस्मृति महाभारत से पुराना ग्रन्थ है। ई. पू. चौथी शताब्दी में स्वायंभुव मनु द्वारा प्रणीत एक धर्मशास्त्र था, जो सम्भवत: पद्य में था। इसी काल में प्राचेतस मनु द्वारा प्रणीत एक राजधर्म भी था। हो सकता है कि दो ग्रन्थों के स्थान पर एक बृहत् ग्रन्थ रहा हो जिसमें धर्म एवं राजनीति दोनों पर विवेचन था। महाभारत ने प्राचेतस का एक वचन उद्धृत किया है जो आज की मनुस्मृति में ज्यों-की-त्यों पाया जाता है।[20] उपर्युक्त दोनों तथाकथित मनु की पुस्तकों की ओर या केवल एक पुस्तक की ओर यास्क, गौतम, बौधायन एवं कौटिल्य संकेत करते हैं। महाभारत भी अपने पहले के पर्वों में ऐसा ही करता है। वह बहुचर्चित ग्रन्थ आज की मनुस्मृति का आधार एव मूलबीज है। तब ई. पू. दूसरी शताब्दी एवं ईसा के उपरान्त दूसरी शताब्दी के बीच सम्भवत: भृगु ने मनुस्मृति का संशोधन किया। यह कृति प्राचीन ग्रन्थ के संक्षिप्त एवं परिवर्धित रूप में प्रकट हुई। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है। कि मनु के बहुत-से उद्धरण जो अन्य पुस्तकों में मिलते हैं, आज की मनुस्मृति में क्यों नहीं प्राप्त होते। बात यह हुई कि संशोधन में बहुत-सी बातें हट गयीं और बहुत-सी आ गयीं। वर्तमान महाभारत वर्तमान मनुस्मृति के बाद की रचना है। नारद-स्मृति का यह कथन कि सुमति भार्गव ने मनु के ग्रन्थ को 4000 श्लोकों में संक्षिप्त किया, कुछ सीमा तक ठीक ही है। आज की मनुस्मृति में लगभग 2700 श्लोक हैं। हो सकता है 4000 श्लोकों में नारद ने वृद्ध-मनु एवं बृहन्मनु के श्लोकों को भी सम्मिलित कर लिया है। मनुस्मृति का प्रभाव भारत के बाहर भी गया। चम्पा के एक अभिलेख में बहुत-से श्लोक मनु[21] से मिलते हैं। बरमा में जो धम्मथट् है, वह मनु पर आधारित है। बालि द्वीप का क़ानून मनुस्मृति पर आधारित था।

टीकाकार और व्याख्याकार

  • मनु के बहुत-से टीकाकार हो गये हैं। मेधातिथि, गोविन्दराज एवं कुल्लूक।
  • इन लोगों के अतिरिक्त व्याख्याकार है नारायण, राधवानन्द, नन्दन एवं रामचन्द्र।
  • कुछ अन्य व्याख्याकार थे जिनकी कृतियाँ पूर्णरूप से उपस्थित नहीं हैं, अन्य हैं एक कश्मीरी टीकाकार (नाम अज्ञात है), असहाय, उदयकर, भागुरि, भोजदेव, धरणीधर।
  • मेधातिथि ने अपने पहले के भाष्यकारों की ओर संकेत किया है।
  • आह्निंक, व्यवहार एवं प्रायन्चित्त पर विश्वरूप[22], मिताक्षरा, स्मृतिचन्द्रिका, पराशरमाधवीय तथा अन्य लेखकों ने वृद्ध-मनु से दर्जनों उद्धरण लिये हैं।
  • मिताक्षरा[23] तथा अन्य कृतियों ने बृहत्मनु से कुछ श्लोक उद्धृत किये हैं। किन्तु अभी तक वृद्ध-मनु एवं बृहन्मनु के कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ उपलब्ध नहीं हो सके हैं।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. शान्ति, 21.12
  2. शान्ति, 59.43
  3. ऋग्वेद 1.80.16; 1.114.2; 2.33.13
  4. मा न: पथ: पित्र्यान्मानवादधि दूरं नैष्ट परावत:। ऋग्वेद, 8.30.3 ।
  5. 'यद्वै किं च मनुरवदत्तद् भेषजम्', -तै0 सं0 2.2.10.2; 'मनुर्वे यत्किंचावदत्तद् भेषजं भेषजतायै', - ताण्ड्य0 23.16.17
  6. शान्तिपर्व, 336.38-46
  7. शान्तिपर्व, 58.80-85
  8. मनुस्मृति, 1.32-33
  9. 1.58
  10. 1.59-60
  11. 5.1-2; 12.1-2
  12. 9.158, 10.78 आदि
  13. 8.139, 279; 9.239 आदि
  14. भार्गवीया नारदीयाबार्हस्पत्याङ्गिरस्यपि। स्वायंभुवस्य शास्त्रस्य चतस्त्र: संहिता भता:॥ चतुर्वर्ग0, दानखण्ड, पृ0 528; संस्कारमयूख, पृ0 2 ।
  15. याज्ञ0 पर भाष्य, 2.73,74, 83, 85, जहाँ मनु0 8,.68, 70-71, 380 एवं 105-6 क्रमश: स्वयंभू के नाम से उद्धृत हैं
  16. देखिए प्रकरण 13
  17. तुलना कीजिए- 'अलब्धलाभार्था लब्धपरिरक्षिणी रक्षितबिबर्धनी वृद्धस्य तीर्थेषु प्रतिपादिनी च।' कोटिल्य (1-4) और 'अलब्धर्मिच्छेद्दण्डेन लब्धं रक्षेदवेक्षया। रक्षितं वर्धयेद् वृद्धचा वृद्धं पात्रेषु निक्षिपेत्॥ मनु0 (7.101)।
  18. 11.33
  19. मृच्छकटिक, 9.39
  20. 3.54
  21. 2. 136
  22. याज्ञ0 पर, 1.69
  23. याज्ञ0 पर, 3.20

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