बीजक

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बीजक
बीजक
कवि कबीर
मूल शीर्षक बीजक
संपादक अभिलाष दास
प्रकाशक पारख प्रकाशन कबीर संस्थान, प्रीतम नगर, सुलेमसराय, इलाहाबाद - 211001
प्रकाशन तिथि सन् 1990
देश भारत
भाषा हिंदी
विधा रमैनी, शब्द
भाग प्रथम

'बीजक' कबीर वाणी का प्रामाणिक ग्रन्थ कहा जाता है। यह कबीर द्वारा ही लिखा गया है, इसमें सन्देह है। कबीर ने जिस भाषा और शैली में अपनी वाणी कही है, वह उनके साहित्यिक एवं शास्त्रीय निष्ठा का प्रमाण नहीं देती। कबीर की साखी यह कहती है- कबीर संसा दूर करु, पुस्तक देई बहाय।

और जनश्रुति यह कहती है कि मसि कागद छूयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ। तब उन्होंने बीजक ग्रन्थ लिखा होगा, इसमें बहुत सन्देह होता है।

मौखिक उपदेश

कबीर ने तो अपने सिद्धान्त और उपदेश मौखिक रूप में ही दिये। उन्होंने सदैव "कहै कबीर सुनो भाई सन्तो" ही कहा, "लिखै कबीर पढ़ो भाई सन्तो" जैसी पंक्ति कभी नहीं लिखी। अत: जो वाणी उन्होंने कही, वह मौखिक रूप में ही प्रचारित हुई। यह बात अवश्य कही जा सकती है कि जो कुछ भी उन्होंने कहा, उसे उनके शिष्यों ने लिखा और कबीर के नाम से प्रचारित किया। यह भी सम्भव है कि शिष्यों की बहुत सी वाणी कबीर के नाम से ही प्रचारित हुई हो। यही कारण है कि आज कबीर के नाम से लगभग 61 ग्रन्थ मिलते हैं, जिनमें से काफ़ी संख्या ऐसे ग्रन्थों की है, जो कबीर के बाद लिखे गये और जिनमें उन सिद्धान्तों की चर्चा है, जिनमें बाह्याचार और कर्मकाण्ड का निरूपण विशेष रूप से हुआ। कबीर ने बाह्याचार और कर्मकाण्ड की सदैव ही निन्दा की। अत: वे ग्रन्थ कबीर द्वारा निर्मित नहीं हो सकते।

बीजक मूल ग्रंथ

कबीरपन्थियों तथा सामान्य पाठकों में 'बीजक' कबीर साहब के सिद्धान्तों का मूल ग्रन्थ माना जाता है। कहा जाता है कि कबीर की चोरी से उनका एक भक्त भगवानदास 'बीजक' की प्रति को ले भागा। कहते हैं बीजक लेकर भागने के कारण ही यह भगवानदास 'भग्गू' के नाम से निन्दित हुआ। 'बीजक' की टीका लिखने वाले 'विश्वनाथ सिंह जू देव' ने कबीर साहब के द्वारा कही गयी बीजक के सम्बन्ध में कुछ चौपाइयों का निर्देश किया है-

"भग्गूदास की खबरि जनाई। ले चरनामृत साधु पियाई।।
कोऊ आप कह कालिंजर गयऊ। बीजक ग्रन्थ चोराइ ले गयऊ।।
सतगुरु कह वह निगुरा पन्थी। काह भयौ लै बीजक ग्रन्थी।।
चोरी करि वै चोर कहाई। काह भयो बड़ भक्त कहाई।
बीजमूल हम प्रगट चिह्नाई। बीज न चीह्नो दुर्मीत लाई।।"

कबीरपन्थी 'महात्मा पूरन साहेब' ने कबीर साहब के मुख्य ग्रन्थ मूल बीजक की जो टीका लिखी है, उसके अनुसार 'बीजक' के निम्नलिखित ग्यारह अंगों का निर्देश और विस्तार निम्न प्रकार से दिया है-

  1. रमैनी - 84,
  2. .शब्द - 115,
  3. .ज्ञान चौंतीसा -34,
  4. विप्रमतीसी - 1,
  5. . कहरा - 12,
  6. वसन्त - 12,
  7. चाचर - 2,
  8. बेलि - 2,
  9. बिरहुली - 1,
  10. . हिंडोला - 3,
  11. . साखी - 353।

'बीजक' शब्द तांत्रिक उपासना से सम्बद्ध ज्ञात होता है। बौद्ध तंत्र में जिन सूत्रों से रहस्यमय तत्त्व की उपलब्धि होती है, उन्हें 'बीज सूत्र' या 'बीजाक्षर' का नाम दिया गया। इसी 'बीजाक्षर' में मन्त्रों की सृष्टि मानी गयी। इस भाँति बीजाक्षर से शब्द तत्त्व का भी बोध हुआ। बौद्ध धर्म की वज्रयानी परम्परा से कालान्तर में सन्त सम्प्रदाय के स्रोत मिलते हैं। इस सन्त सम्प्रदाय में शब्द का बहुत महत्त्व है। सन्त सम्प्रदाय के काव्य में 'शब्द' और 'साखी' का विशिष्ट अर्थ और महत्त्व समझा जाता है। इसी 'बीजक' ग्रन्थ में 'रमैनी' (37) में 'बीजक' के सम्बन्ध में विवेचन किया गया है-

"एक सयान सयान न होई। दूसर सयान न जाने कोई।।
तीसर सयान सयान दिखाई। चौथे सयान तहाँ ले जाई।।
पचये सयान न जाने कोई। छठये मा सब गैल बिगोई।।
सतयाँ सयान जो जानहु भाई। लोक वेद मों देउ देखाई।।"

"बीजक वित्त बतावै। जो वित्त गुप्ता होय।
ऐसे शब्द बतावै जीवको। बुझे बिरला कोय।" - साखी

उपर्युक्त उद्धरण में 'बीजक' का सम्बन्ध 'शब्द' से ही जोड़ा गया है। सयान की मीमांसा निम्न प्रकार से समझी जा सकती है-

इस भाँति 'बीजक' वास्तविक तत्त्व का बोधक है। यह तत्त्व संसार में गुप्त रहता है। 'बीजक' के द्वारा ही ब्रह्म के वास्तविक तत्त्व (शब्द) का बोध होता है, जिससे समस्त सृष्टि का निर्माण हुआ है।[1]

बीजक का मुद्रण

कबीर की वाणियों में 'बीजक' का मुद्रण सबसे पहले हुआ। इसका कारण है कि कबीरपन्थी 'बीजक' को सर्वाधिक प्रामाणिक तथा आदरणीय ग्रन्थ मानते हैं। रीवा नरेश 'श्री विश्वनाथ सिंह' की टीका के साथ 'बीजक' 1872 ई. से पहले मुद्रित हुआ था। पादरी प्रेमचन्द, पूर्णदास, पादरी अहमदशाह, महर्षि शिवव्रत लाल, विचारदास, साधु लखन दास, हनुमान दास, भगवान साहब, गोस्वामी साहब, महाराज राघवदास, हंसदास आदि अनेक विद्वानों तथा सन्तों ने 'बीजक' का मूलपाठ टीका सहित सम्पादित करके प्रकाशित कराया है।

अनुवाद
भाषा

निरंजनी दोनों शाखाओं से सम्बन्धित प्रतियों पर राजस्थानी भाषा का व्यापक प्रभाव है। इनकी निरन्तर प्रतिलिपियाँ होती रहीं और भाषा का रूपान्तरण होता रहा। साखियों पर राजस्थानी का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक है। पदों (सबद) तथा रमैनियों पर यह प्रभाव कम है। डॉक्टर पारसनाथ तिवारी ने इस भेद का कोई कारण निर्दिष्ट नहीं किया। वास्तव में साखियों में जो छन्द अपनाया गया है, वह अपभ्रंश का दूहा छन्द है। अपभ्रंश भाषा का केन्द्र राजस्थान, गुजरात तथा सिन्ध रहा है। अपभ्रंश का प्रचार-प्रसार लगभग सम्पूर्ण हिन्दी प्रदेश में हुआ। उत्तरवर्ती अपभ्रंश[3] में पूर्वी क्षेत्र के कवियों ने रचनाएँ की हैं। सरहपा और कण्हपा के 'दोहा कोश' की भाषा अवहट्ठ है। यह भाषा राजस्थान से आभीरों के साथ पूर्वी भारत में काव्य भाषा के रूप में पहुँची थी। विद्यापति ने भी अपनी दो रचनाओं 'कीर्तिलता' और 'कीर्ति पताका' में इसी भाषा को माध्यम बनाया था। सरहपा से लेकर विद्यापति तक भाषा के दोहरे रूपों का प्रयोग परिलक्षित होता है। इन कवियों ने गीतों की रचना पूर्वी भाषा में की है और दोहों तथा प्रबन्ध काव्यों की रचनाएँ परम्परित काव्यभाषा अवहट्ठ में की हैं। कबीर का भाषिक आदर्श इसी परम्परा के अनुरूप है। इसीलिए उनकी भाषा में राजस्थानी तत्त्वों की अपलब्धता आश्चर्यजनक नहीं है।[4]

बीजक कबीर का सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रन्थ

बीजक के अतिरिक्त कबीर के नाम से प्रचलित अन्य वाणियाँ कबीर के द्वारा ही कही गयी हैं, क्योंकि उनमें प्रक्षेपों की भरमार है। परन्तु यह भी नहीं कहा जा सकता कि 120 वर्ष के लम्बे जीवन में उन्होंने बीजक के अतिरिक्त और कुछ कहा ही नहीं है। बीजक के अतिरिक्त भी उनकी बहुत सारी वाणियाँ हैं; परन्तु उनकी समस्त वाणियों में बीजक सर्वाधिक प्रामाणिक है। प्रसिद्ध वैष्णव सन्त नाभादास जी महाराज ने कबीर की प्रशंसा करते हुए जो छप्पय कहा है, उसकी एक पंक्ति है- "हिन्दू तुरुक प्रमान रमैनी शब्दी साखी।"

रमैनी, शब्द और साखी का यह क्रम किसी और 'कबीर वाणी' में नहीं, अपितु 'बीजक' में ही है। बीजक ही ऐसा ग्रन्थ है, जिसमें कबीर का क्रान्तिकारी स्वरूप पूर्ण रूप उभरा है।[5]

बीजक पदों का गूढ़त्व और सूत्रत्व

बीजक में कबीर ने अपने नामवाची कबीर, कबिरा, कबीरा, कबिरन, कबीरन आदि अनेक शब्दों का प्रयोग किया है। ऐसा उन्होंने क्यों किया, स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। कुछ टीकाकारों के ख्याल से ये शब्द एकार्थबोधक हैं और कबीर ने इन सबका प्रयोग अपने लिए ही किया है, केवल छन्द प्रवाह बनाये रखने के लिए मात्राओं में हेर-फेर है। कुछ अन्य टीकाकारों के ख्याल से उपरोक्त सभी शब्द भिन्न-भिन्न अर्थ बोधक हैं। परन्तु दोनों दृष्टि एकांगी हैं। उपर्युक्त सभी शब्द हर जगह कबीर के नाम एवं व्यक्तित्व से भिन्न अर्थ रखते हैं, ऐसी बात नहीं है, परन्तु हर जगह इन सबका एक ही अर्थ किया जाए तो पूरे अर्थ की संगति ही नहीं बैठ सकती। उदाहरणार्थ-

भ्रमि भ्रमि कबिरा फिरै उदास; कबिरन ओट राम की पकरी,
अन्त चले पछिताई; कबिरन भक्ति बिगारिया,
कंकर पत्थर धोय; झूठा खसम कबीरन जाना;
कबिरा बनौरी गावै; तथा तामहँ भ्रमि-भ्रमि रहल कबीरा।[6]

बीजक हमें बरबस ही सूत्र ग्रन्थों की याद दिलाता है, जिसमें छोटा-सा वाक्य बहुत बड़े अर्थगांभीर्य एवं भाव को छिपाये रहता है। बीजक में रूपक, प्रतीक, अन्योक्तिकथन, उलटवांसी शैली, कहीं पूर्वपक्ष की मान्यताओं का प्रदर्शन कराने के लिए कहे गये वचन आदि होने से हर सिद्धान्त के मानने को अपने दार्शनिक सिद्धान्त की स्थापना के लिए जगह मिल जाती है।[7]

बीजक की अनेक टीकाएँ

देशी-विदेशी अनेक विद्वानों द्वारा बीजक को प्रामाणिक कबीर साहित्य मानकर उसकी अब तक दर्जनों टीकाएँ हो चुकी हैं तथा आज भी होती जा रही हैं। बीजक की अब तक हुई अनेक टीकाएँ ऐसी हैं, जिनकी भाषा-शैली पुरानी होने से वह आज सबकी समझ में ठीक से नहीं आती। कुछ में तो अर्थ अत्यन्त अस्पष्ट एवं भ्रामक हो गया है। और कुछ टीकाएँ तो ऐसी हुई हैं, जिनमें सारे पाखण्ड एवं कुरीतियों को जलाकर राख कर देने वाला कबीर का क्रान्तिकारी विदग्धात्मक रूप ही ओझल हो गया है और वहाँ पर कबीर को परम्परापोषित भक्तकवि बनाकर रख दिया गया है तथा उन्हें किसी अदृश्य, अज्ञात शक्ति के आगे गिड़गिड़ाने वाला भावुक भक्त बना डाला गया है। [8]



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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. वर्मा, धीरेंद्र हिन्दी साहित्य कोश, भाग - 2 (हिंदी), 388।
  2. भगताही शाखा के मानसर गद्दी वाला बीजक एवं बीजक फतुहा
  3. जिसे अवहट्ठ कहा गया है
  4. शर्मा, रामकिशोर कबीर ग्रन्थावली (हिंदी), 08।
  5. दास, अभिलाष “भाग-1”, बीजक (हिंदी), 14।
  6. केवल 86 वें शब्द में 1 बार 'कबिंरा', 4 बार 'कबीरा' कहकर छठीं बार 'कहहिं कबीर' का प्रयोग हुआ है।
  7. दास, अभिलाष “भाग-1”, बीजक (हिंदी), 15।
  8. दास, अभिलाष “भाग-1”, बीजक (हिंदी), 15।

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