तानसेन

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तानसेन
तानसेन
पूरा नाम रामतनु पाण्डेय
अन्य नाम तन्ना उर्फ तनसुख उर्फ त्रिलोचन
जन्म 1504 से 1509 ई. के बीच
जन्म भूमि ग्राम बेहट, ग्वालियर
मृत्यु 1585 ई.
मृत्यु स्थान दिल्ली
अविभावक श्री मकरंद पांडे
कर्म-क्षेत्र संगीतज्ञ
मुख्य रचनाएँ 'संगीतसार', 'रागमाला' और 'श्रीगणेश स्तोत्र'।
विषय संगीत
नागरिकता भारतीय

संगीत सम्राट् तानसेन (जन्म- संवत 1563, बेहट ग्राम; मृत्यु- संवत 1646) की गणना भारत के महान गायकों, मुग़ल संगीत के संगीतकारों एवं बेहतरीन संगीतज्ञों में की जाती है। तानसेन का नाम अकबर के प्रमुख संगीतज्ञों की सूची में सर्वोपरि है। तानसेन दरबारी कलाकारों का मुखिया और समाट् के नवरत्नों में से एक था। इस पर भी उसका प्रामाणिक जीवन-वृत्तांत अज्ञात है। यद्यपि काव्य-रचना की दृष्टि से तानसेन का योगदान विशेष महत्त्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता, परंतु संगीत और काव्य के संयोग की दृष्टि से, जो भक्तिकालीन काव्य की एक बहुत बड़ी विशेषता थी, तानसेन साहित्य के इतिहास में अवश्य उल्लेखनीय है। उसके जीवन की अधिकांश घटनाएँ किंवदंतियों एवं अनुश्रुतियों पर आधारित हैं। प्रसिद्ध कृष्ण-भक्त स्वामी हरिदास इनके दीक्षा-गुरु कहे जाते हैं। "चौरासी वैष्णवन की वार्ता" में सूर से इनके भेंट का उल्लेख हुआ है। "दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता" में गोसाई विट्ठलनाथ से भी इनके भेंट करने की चर्चा मिलती है।

प्राचीन धरोहरों की रक्षा

तानसेन अपनी दिव्य प्रभा फैलाकर भारतीय संगीत के गगनांगन पर उदय हुये और चले गये। हमारे देश में तानसेन भारतीय संगीत के वह सूर्य थे कि जिनके संगीत प्रकाश ने एक अपूर्व आभा फैलाई। ध्रुवपद गायकी हमारे देश की प्राचीन गायकी है और तानसेन इस गायकी के शीर्ष गायक थे। तानसेन और उनके संगीत के संबंध में आज भी गहन शोध की आवश्यकता है। भारतीय संगीत को आज के समय के संगीत, डिस्को, पॉप से बचाकर रखने की आवश्यकता है। हमें अपने प्राचीन संगीत की रक्षा करनी होगी क्योंकि हमारी पहचान हमारी संस्कृति से ही होगी। यह बहुत आवश्यक है कि हम अपनी प्राचीन धरोहरों की रक्षा करें।[1]

जीवन परिचय

तानसेन की जीवनी के सम्बन्ध में बहुत कम ऐसा वृत्त ज्ञात है, जिसे पूर्ण प्रामाणिक कहा जा सके। भारतीय संगीत के प्रसिद्ध गायक तानसेन का जन्म मुहम्मद ग़ौस नामक एक सिद्ध फ़क़ीर के आशीर्वाद से ग्वालियर से सात मील दूर एक छोटे-से गाँव बेहट में संवत 1563 में वहाँ के एक ब्राह्मण कुल में हुआ था।[2] इनके पिता का नाम मकरंद पांडे था। पांडित्य और संगीत-विद्या में लोकप्रिय होने के साथ-साथ मकरंद पांडे को धन-धान्य भी यथेष्ट रूप से प्राप्त था। तानसेन की माता पूर्ण साध्वी व कर्मनिष्ठ थीं। तानसेन का पालन-पोषण बड़े लाड़-प्यार से हुआ। एकमात्र संतान होने के कारण इनके माँ-बाप ने किसी प्रकार का कठोर नियंत्रण भी नहीं रखा।

मूल नाम

तानसेन का मूल नाम क्या था, यह निश्चय पूर्वक कहना कठिन है, किंवदंतियों के अनुसार उन्हें तन्ना, त्रिलोचन, तनसुख, अथवा रामतनु बतालाया जाता है। तानसेन इनाका नाम नहीं इनकी उपाधि थी, जो तानसेन को बांधवगढ़ के राजा रामचंद्र से प्राप्त हुई थी। वह उपाधि इतनी प्रसिद्ध हुई कि उसने इनके मूल नाम को ही लुप्त कर दिया। इनका जन्म-संवत् भी विवादग्रस्त है। हिन्दी साहित्य में इनके जन्म की संवत 1588 की प्रसिद्धि है किंतु कुछ विद्वानों ने संवत 1563 माना है।[3] तानसेन के मधुर कंठ और गायन शैली की ख्याति सुनकर 1562 ई. के लगभग अकबर ने उन्हें अपने दरबार में बुला लिया। अबुल फ़जल ने 'आइना-ए-अकबरी' में लिखा है कि अकबर ने जब पहली बार तानसेन का गाना सुना तो प्रसन्न होकर पुरस्कार में दो लाख टके दिए। तानसेन के कई पुत्र थे, और एक पुत्री थी। पुत्रों में तानतरंग ख़ाँ, सुरतिसेन और विलास ख़ाँ के नाम प्रसिद्ध हैं। उनके पुत्रों एवं शिष्यों के द्वारा "हिन्दुस्तानी संगीत" की बड़ी उन्नति हुई थी।

संगीत शिक्षा

तानसेन के आरंभिक काल में ग्वालियर पर कलाप्रिय राजा मानसिंह तोमर का शासन था। उनके प्रोत्साहन से ग्वालियर संगीत कला का विख्यात केन्द्र था, जहाँ पर बैजूबावरा, कर्ण और महमूद जैसे महान संगीताचार्य और गायक गण एकत्र थे, और इन्हीं के सहयोग से राजा मानसिंह तोमर ने संगीत की ध्रुपद गायकी का आविष्कार और प्रचार किया था। तानसेन को संगीत की शिक्षा ग्वालियर में वहाँ के कलाविद् राजा मानसिंह तोमर के किसी विख्यात संगीताचार्य से प्राप्त हुई थी। गौस मुहम्मद को उसका संगीत-गुरु बतलाना अप्रमाणित सिद्ध हो गया है। उस सूफी संत के प्रति इनकी श्रद्धा भावना रही हो, यह संभव जान पड़ता है।

ग्वालियर राज्य का पतन हो जाने पर वहाँ के संगीताचार्यों की मंडली बिखरने लगी थी। उस परिस्थिति में तानसेन को ग्वालियर में उच्च शिक्षा प्राप्त करना संभव ज्ञात नहीं हुआ। वह वृंदावन चले गए थे, जहाँ उसने संभवतः स्वामी हरिदास जी से संगीत की उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। वल्लभ संप्रदायी वार्ता के अनुसार तानसेन ने अपने उत्तर जीवन में अष्टछाप के संगीताचार्या गोविंदस्वामी से भी कीर्तन पद्धति का गायन सीखा था।[4]

आश्चर्यजनक प्रतिभा

तानसेन दस वर्ष की अवस्था तक पूर्णरूपेण स्वतंत्र, सैलानी व नटखट प्रकृति के हो गए थे। इस बीच इनके अन्दर एक आश्चर्यजनक प्रतिभा देखी गई, वह थी आवाज़ों की हू-ब-हू नक़ल करना। किसी भी पशु-पक्षी की आवाज़ की नक़ल कर लेना इनका खेल था। शेर की बोली बोलकर अपने बाग़ की रखवाली करने में इन्हें बड़ा मज़ा आया करता था।

एक दिन वृन्दावन के महान संगीतकार सन्यासी स्वामी हरिदास जी अपनी शिष्य-मंडली के साथ उक्त बाग़ में होकर गुज़रे, तो बालक "तन्ना" ने एक पेड़ की आड़ में छुपकर शेर जैसी दहाड़ लगाई। डर के मारे सब लोगों के दम फूल गये स्वामी जी को उस स्थान पर शेर रहने का विश्वास नहीं हुआ और तुरंत खोज की। उन्हें दहाड़ता हुआ बालक मिल गया। बालक के इस क़ौतुक पर स्वामी जी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने जब अन्य पशु-पक्षियों की आवाज़ भी बालक से सुनी, तो मुग्ध हो गए और उसके पिताजी से बालक को संगीत-शिक्षा देने के निमित्त माँग-कर अपने साथ ही वृदावन ले आए। गुरु की कृपा से 10 वर्ष की अवधि में ही बालक तन्ना धुरंधर गायक बन गया और यहीं से इसका नाम "तन्ना" की बजाय "तानसेन" हो गया। गुरुजी का आशीर्वाद पाकर तानसेन ग्वालियर लौट आए। इसी समय इनके पिताजी की मृत्यु हो गई। मृत्यु से पूर्व पिता ने तानसेन को उपदेश दिया कि तुम्हारा जन्म मुहम्मद ग़ौस नामक फ़क़ीर की कृपा से हुआ है इसलिए तुम्हारे शरीर पर पूर्ण अधिकार उसी फ़क़ीर का है। अपनी ज़िन्दगी में उस फ़क़ीर की आज्ञा की कभी अवहेलना मत करना। पिता का उपदेश मानकर तानसेन फ़क़ीर मुहम्मद ग़ौस के पास आ गए। फ़क़ीर साहब ने तानसेन को अपना उत्तराधिकारी बनाकर अपना अतुल वैभव आदि सब कुछ उन्हें सौंप दिया और अब तानसेन ग्वालियर में ही रहने लगे।

विवाह

तानसेन का परिचय राजा मानसिंह की विधवा पत्नी रानी मृगनयनी से हुआ। रानी मृगनयनी भी बड़ी मधुर तथा विदुषी गायिका थीं। वे तानसेन का गायन सुन कर बहुत प्रभावित हुईं। उन्होंने अपने संगीत-मंदिर में शिक्षा पाने वाली हुसैनी ब्राह्मणी नामक एक सुमधुर गायिका लड़की के साथ तानसेन का विवाह कर दिया। हुसैनी का वास्तविक नाम प्रेमकुमारी था। हुसैनी के पिता सारस्वत ब्राह्मण थे, किंतु बाद में यह अपरिवार मुस्लिम धर्म में दीक्षित हो गए। प्रेमकुमारी का इस्लामी नाम हुसैनी रखा गया। ब्राह्मणी कन्या होने के कारण सभी उसे हुसैनी ब्राह्मणी कहकर पुकारते थे, इसी से तानसेन का घराना 'हुसैनी घराना' कहा जाने लगा था।

संगीत कला के संस्कार

विवाह के पश्चात् तानसेन पुनः अपने गुरु जी के आश्रम (वृन्दावन) में शिक्षा प्राप्त करने पहुँचे। इसी समय फ़क़ीर मुहम्मद ग़ौस का अंतिम समय निकट आ गया। फलस्वरूप गुरु जी के आदेश पर तानसेन को तुरंत ग्वालियर वापस आना पड़ा। फ़क़ीर साहब की मृत्यु हो गई और तानसेन एक विशाल संपत्ति के अधिकारी बन गए। वह ग्वालियर में रहकर आनंदपूर्वक गृहस्थ-जीवन व्यतीत करने लगे। तानसेन के चार पुत्र और एक पुत्री का जन्म हुआ। पुत्रों का नाम- सुरतसेन, तरंगसेन, शरतसेन, और विलास ख़ाँ तथा लड़की का नाम सरस्वती रखा गया। तानसेन की सभी संतानें संगीत-कला के संस्कार लेकर पैदा हुईं। सभी बच्चे उत्कृष्ट कलाकार हुए।

संगीत-साधना पूर्ण होने के बाद सर्वप्रथम तानसेन को रीवा-नरेश रामचन्द्र (राजाराम) अपने दरबार में ले गए। इन्हीं दिनों तानसेन का सौभाग्य-सूर्य चमक उठा। महाराजा ने तानसेन जैसे दुर्लभ रत्न को बादशाह अकबर को भेंट कर कर दिया। सन् 1556 ई. में तानसेन अकबर के दरबार में दिल्ली गए। बादशाह ऐसे अमूल्य रत्न को पाकर अत्यंत प्रसन्न हुआ और तानसेन को उसने अपने नवरत्नों में सम्मिलित कर लिया।

जीविकोपार्जन

संगीत कला में पारंगत होने पर तानसेन को जीविकोपार्जन की चिंता हुई। ऐसा ज्ञात होता है, वह सर्वप्रथम सुलतान इस्लामशाह सूर के स्नेह-पात्र दौलतखां के आश्रय रहा था। उसी समय वह मुहम्मद आदिलशाह (अदली) सूर के संपर्क में आया था, जिसकी संगीतज्ञता के कारण उसे वह गुरुवत् मानता था। सूरी सल्तनत की समाप्ति होने पर वह बांधवगढ़ के राजा रामचंद्र की संगीत-प्रियता और गुण-ग्राहकता की ख्याति सुन कर उसके दरबार में चला गया था। बांधव-नरेश ने उन्हें बड़े आदर पूर्वक रखा। वहाँ पर उन्हें विपुल धन-वैभव तथा आदर-सम्मान प्राप्त हुआ, और उनकी व्यापक प्रसिद्धि हुई। संवत 1620 में उसे सम्राट अकबर ने अपने दरबार में बुला लिया था। उस समय उसकी आयु 50 वर्ष से कुछ अधिक थी। फिर वह अपने देहावसान काल तक अकबर के आश्रय में ही रहा था।

मुसलमान होने की किंवदंती

हिन्दू कुल में जन्म लेने पर भी बाद में तानसेन के मुसलमान होने की किंवदंती प्रचलित है। किंतु इसका समर्थन किसी भी समकालीन इतिहासकार के ग्रंथ से नहीं होता है। ऐसा जान पड़ता है, इनका मुसलमानों के साथ अधिक संपर्क और सहवास तथा उनके खान-पान की स्वच्छता के कारण उस समय रूढ़िवादी हिन्दुओं ने उनका वहिष्कार कर उन्हें मुसलमान घोषित कर दिया था। वह कभी मुसलमान हुए हो, इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता है। तानसेन की मृत्यु होने पर उसकी शवयात्रा का जैसा वर्णन अबुल फ़जल ने किया है, उससे सिद्ध होता है कि वह अपने अंतिम काल तक भी हिन्दू रहे थे।

तानसेन के वंशजों ने अवश्य मुसलमानी मज़हब स्वीकार कर लिया था। उनकी वंश-परंपरा में कुछ नाम हिन्दुओं के से मिलते हैं और उनमें हिन्दुओं की सी कई रीतिरिवाजें प्रचलित हैं। इनसे समझा जा सकता है कि मुसलमान हो जाने पर भी वे अपने पूर्वजों की हिन्दू परंपरा का पूर्णतया परित्याग नहीं कर सके थे।

अकबरनामा के अनुसार

'अकबरनामा' के अनुसार तानसेन की मृत्यु अकबरी शासन में 34वें वर्ष अर्थात संवत 1646 में आगरा में हुई थी। उनका संस्कार भी संभवतः वहीं पर यमुना तट पर किया गया होगा। कालांतर में उनके जन्मस्थान ग्वालियर में स्मारक स्वरूप उनकी समाधि उनके श्रद्धा-भाजन गौस मुहम्मद के मक़बरे के समीप बनाई गई, जो अब भी विद्यमान है। तानसेन की आयु उसकी मृत्यु के समय 83 वर्ष के लगभग थी। और वह प्रायः 26 वर्ष तक अकबरी दरबार में संबद्ध रहा था। उसके कई पुत्र थे, एक पुत्री थी और अनेक शिष्य थे। पुत्रों में तानतरंग ख़ाँ, सुरतसंन और विलास ख़ाँ, के नाम से प्रसिद्ध हैं। पुत्रों में तानतरंग ख़ाँ, और शिष्यों में मियाँ चाँद के नाम अकबर के प्रमुख दरबारी संगीतज्ञों में मिलते हैं।

रचनाएँ

नये रागों का आविष्कार

तानसेन ग्वालियर परंपरा की मूर्च्छना पद्धति के एवं ध्रुपद शैली के विख्यात गायक और कई रागों के विशेषज्ञ थे। इनको ब्रज की कीर्तन पद्धति का भी पर्याप्त ज्ञात था। साथ ही वह ईरानी संगीत की मुकाम पद्धति से भी परिचित थे। उन सब के समंवय से उसने अनेक नये रागों का आविष्कार किया था, जिनमें "मियाँ की मलार" अधिक प्रसिद्ध है। तानसेन के गायन की प्रशंसा में कई चमत्कारपूर्ण किंवदंतियाँ प्रचलित हैं, किंतु उनकी प्रामाणिकता संदिग्ध है।

ध्रुपदों की रचना

तानसेन गायक होने के साथ ही कवि भी थे। उसने अपने गान के लिए स्वयं बहुसंख्यक ध्रुपदों की रचना की थी। उनमें से अनेक ध्रुपद संगीत के विविध ग्रंथों में और कलावंतों के पुराने घरानों में सुरक्षित हैं। तानसेन के नाम से "संगीत-सार और "राग-माला" नामक दो ग्रंथ भी मिलते हैं[5]

ग्रंथ "संगीत-सम्राट तानसेन" में उसके रचे हुए 288 ध्रुपदों का संकलन है। ये ध्रुपद विविध विषयों से संबंधित हैं। इसके अतिरिक्त उनके ग्रंथ "संगतिदार" और "रागमाला" भी संकलित हैं। यहाँ पर तानसेन कृत "कृष्ण लीला" के कुछ ध्रुपद उदाहरणार्था प्रस्तुत हैं-

पलना-झूलन-

हमारे लला के सुरंग खिलौना, खेलत, खेलत कृष्ण कन्हैया।
अगर-चंदन कौ पलना बन्यौ है, हीरा-लाल-जवाहर जड़ैया॥
भँवरी-भँवरा, चट्टा-बट्टा, हंस-चकोर, अरू मोर-चिरैया॥
तानसेन प्रभु जसोमति झुलावै, दोऊ कर लेत बलैया।

गो-चारन-

धौरी-ध्रुमर, पीयरी-काजर कहि-कहि टेंरै।
मोर मुकट सीस, स्त्रवन कुंडल कटि में पीतांबर पहिरै॥ ग्वाल-बाल सब सखा संग के, लै आवत ब्रज नैरै।
"तानसेन" प्रभु मुख रज लपटानी जसुमति निरखि मुख है रै।

आजु हरि लियै अनहिली गैया, एक ही लकुटि सों हाँकी॥
ज्यों-ज्यों रोकी मोहन तुम सोई, त्यों-त्यों अनुराग हियं देखत मुखां की।
हम जो मनावत कहूँ तूम मानत, वे बतियाँ गढ़ि बॉकी॥
तृन नहीं चरत, बछरा नहीं चौखत की,
हम कहा जानै, को है कहाँ की।
तानसेन प्रभु वेगि दरस दीजै सब मंतर पढ़ि आँकी॥[6]

प्रथम उठ भोरही राधे-किशन कहो मन, जासों होवै सब सिद्ध काज।
इहि लोक परलोक के स्वामी, ध्यान धरौ ब्रजराज॥
पतित उद्धारन जन प्रतिपालन, दीनदयाल नाम लेत जाय दुख भाज।
"तानसेन" प्रभु कों सुमरों प्रातहिं, जग में रहै तेरी लाज॥
मुरली बजावै, आपन गावै, नैन न्यारे नंचावै, तियन के मन कों रिझावै।
दूर-दूर आवै पनघट, काहु के धटन दुरावै, रसना प्रेम जनावै॥
मोहिनी मूरत, सांवती सूरत, देखत ही मन ललचावै।
"तानसेन" के प्रभु तुम बहुनायक, सबहिंन के मन भावै॥

असीम संभावनाएँ निहित

हर युग एक महान गायक हुआ करता है। तानसेन सिर्फ एक महान गायक ही नहीं बल्कि एक महान संगीतशास्त्री एवं रागों के रचयिता भी थे। जाति एवं रागों की प्राचीन मान्यताओं को तोड़ कर नये प्रयोगों की परंपरा को प्रारम्भ करने में वे अग्रणी थे। भारतीय संगीत में स्वरलिपि की कोई पद्धति नहीं होने के कारण प्राचीन गायकों की स्वररचना को जानने का कोई साधन नहीं है। संगीत के क्षेत्र में आज भी तानसेन का प्रभाव जीवित है। उसका कारण है ‘‘मियाँ की मल्हार’’ ‘‘दरबारी कानडा’’ और ‘‘मियाँ की तोड़ी’’ जैसी मौलिक स्वर रचनाओं का सदाबहार आकर्षण। उस समय के लोकप्रिय राग ध्रुपद की समृद्धता का कारण भी तानसेन की प्रतिभा ही थी।

तानसेन के दीपक राग से दीप के जल उठने एवं राग मेघ-मल्हार से वर्षा होने की किंवदंतियों के ऐतिहासिक प्रमाण भले ही न हों, किन्तु उनमें इस सत्यता का अंश ज़रूर है कि अगर तानसेन जैसा महान गायक हो तो संगीत में असीम संभावनाएँ निहित हैं।[7]

अकबर के नवरत्न

अकबर के नवरत्नों तथा मुग़लकालीन संगीतकारों में तानसेन का नाम परम-प्रसिद्ध है। यद्धपि काव्य-रचना की दृष्टि से तानसेन का योगदान विशेष महत्त्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता, परन्तु संगीत और काव्य के संयोग की दृष्टि से, जो भक्तिकालीन काव्य की एक बहुत बड़ी विशेषता थी, तानसेन साहित्य के इतिहास में अवश्य उल्लेखनीय है। तानसेन अकबर के नवरत्नों में से एक थे। एक बार अकबर ने उनसे कहा कि वो उनके गुरु का संगीत सुनना चाहते हैं। गुरु हरिदास तो अकबर के दरबार में आ नहीं सकते थे। लिहाज़ा इसी निधि वन में अकबर हरिदास का संगीत सुनने आए। हरिदास ने उन्हें कृष्ण भक्ति के कुछ भजन सुनाए थे। अकबर हरिदास से इतने प्रभावित हुए कि वापस जाकर उन्होंने तानसेन से अकेले में कहा कि आप तो अपने गुरु की तुलना में कहीं आस-पास भी नहीं है। फिर तानसेन ने जवाब दिया कि जहांपनाह हम इस ज़मीन के बादशाह के लिए गाते हैं और हमारे गुरु इस ब्रह्मांड के बादशाह के लिए गाते हैं तो फ़र्क़ तो होगा न।

रचनाएँ

तानसेन के नाम के संबंध में मतैक्य नहीं है। कुछ का कहना है कि 'तानसेन' उनका नाम नहीं, उनकों मिली उपाधि थी। तानसेन मौलिक कलाकार थे। वे स्वर-ताल में गीतों की रचना भी करते थे। तानसेन के तीन ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है-

  1. 'संगीतसार',
  2. 'रागमाला' और
  3. 'श्रीगणेश स्तोत्र'।

दीपक राग

यह तानसेन का शौर्यकाल था। बादशाह का अटूट स्नेह और सम्मान पाकर तानसेन की यश-पताका उन्मुक्त होकर लहराने लगी। अकबर तानसेन के संगीत का ग़ुलाम बन गया। काला-पारखी अकबर तानसेन की संगीत-माधुरी में डूब गया। बादशाह पर तानसेन का ऐसा पक्का रंग सवार देख कर दूसरे दरबारी गायक जलने लगे और एक दिन उन्होंने तानसेन के विनाश की योजना बना डाली। किंवदंती है कि ये सब लोग बादशाह के पास पहुँचकर कहने लगे- "हुज़ूर, हमें तानसेन से 'दीपक' राग सुनवाया जाए और आप भी सुनें। इसको तानसेन के अलावा और कोई ठीक-ठीक नहीं गा सकता।" बादशाह राज़ी हो गए। तानसेन द्वारा इस राग का अनिष्टकारक परिणाम बताए जाने और लाख मना करने पर भी अकबर का राजहट नहीं टला और उसे दीपक राग गाना ही पड़ा। राग जैसे-ही शुरू हुआ, गर्मी बढ़ी व धीरे-धीरे वायुमंडल अग्निमय हो गया। सुनने वाले अपने-अपने प्राण बचाने को इधर-उधर छिप गए, किंतु तानसेन का शरीर अग्नि की ज्वाला से जल उठा। उसी समय तानसेन अपने घर भागे। वहाँ उनकी लड़की तथा एक गुरुभगिनी ने मेघ राग गाकर उनके जीवन की रक्षा की। इस घटना के कई मास पश्चात् तानसेन का शरीर स्वस्थ हुआ। अकबर भी अपनी ग़लती पर बहुत पछताया।

चमत्कारी घटनाएँ

यह कहा जाता है कि तानसेन के जीवन में पानी बरसाने, जंगली पशुओं को मंत्र- मुग्ध करने तथा रोगियों को ठीक करने आदि की अनेक संगीत-प्रधान चमत्कारी घटनाएँ हुईं। यह निर्विवाद सत्य है कि गुरु-कृपा से उन्हें बहुत-सी राग-रागनियाँ सिद्ध थीं। और उस समय देश में तानसेन जैसा दूसरा कोई संगीतज्ञ नहीं था। तानसेन ने व्यक्तिगत रूप से कई रागों का निर्माण भी किया, जिनमें दरबारी कान्हड़ा, मियाँ की सारंग मियाँमल्लार आदि उल्लेखनीय हैं।

मृत्यु

इस प्रकार अमर संगीत की सुखद वैखरी बहाता हुआ यह महान संगीतज्ञ मृत्यु के निकट भी आ पहुँचा। दिल्ली में ही तानसेन ज्वर से पीड़ित हुए। तानसेन ने अपना अंतिम समय जानकर ग्वालियर जाने की इच्छा प्रकट की, परंतु बादशाह के मोह और स्नेह के कारण तानसेन फ़रवरी, सन् 1585 ई. में दिल्ली में ही स्वर्गवासी हो गए। इच्छानुसार तानसेन का शव ग्वालियर पहुँचाया गया और मुहम्मद ग़ौस की क़ब्र के बराबर उनकी समाधि बना दी गई। तानसेन की मृत्यु के पश्चात् उनका कनिष्ठ पुत्र विलास ख़ाँ तानसेन के संगीत को जीवित रखने व उनकी कीर्ति को प्रसारित करने में समर्थ हुआ। भारतीय संगीत के इतिहास में ध्रुपदकार के रूप में तानसेन का नाम सदैव अमर रहेगा। इसके साथ ही ब्रजभाषा के पद साहित्य का संगीत के साथ जो अटूट सम्बन्ध रहा है, उसके सन्दर्भ में भी तानसेन चिरस्मरणीय रहेंगे।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. तानसेन (हिन्दी) भारतीय साहित्य संग्रह। अभिगमन तिथि: 3 अप्रैल, 2011
  2. तानसेन की जन्म तिथि तथा सन् के बारे में विविध मत पाए जाते हैं। कुछ लेखक इनका जन्म सन् 1506 ई. और 1520 ई. बताते हैं।
  3. दोसौ बावन वैष्णवन की वार्ता (द्वितीय खंड, पृष्ठ 156
  4. अकबरनामा (अंग्रेज़ी अनुवाद) जिल्द 2, पृष्ठ 880
  5. लेखक कृत ब्रज की कलाओं का इतिहास, पृष्ठ 448-450
  6. लेखक कृत "संगीत सम्राट तानसेन" ध्रुपद सं. 253, 255,और 256
  7. तानसेन (हिन्दी) भारतीय साहित्य संग्रह। अभिगमन तिथि: 3 अप्रैल, 2011

(सहायक ग्रन्थ-

  1. संगीतसम्राट तानसेन (जीवनी और रचनाएँ): प्रभुदयाल मीतल, साहित्य संस्थान, मथुरा;
  2. हिन्दी साहित्य का इतिहास: पं. रामचन्द्र शुक्ल:
  3. अकबरी दरबार के हिन्दी कबि: डा. सरयू प्रसाद अग्रवाल।)

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